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मिथिलाक इतिहास -प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी
(courtsey: http://www.videha.co.in/ and Shri Prabhat Kumar Choudhary)
प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी (१५ फरबरी १९२१- १५ मार्च १९८५) अपन सम्पूर्ण जीवन बिहारक इतिहासक सामान्य रूपमे आ मिथिलाक इतिहासक विशिष्ट रूपमे अध्ययनमे बितेलन्हि। प्रोफेसर चौधरी गणेश दत्त कॉलेज, बेगुसरायमे अध्यापन केलन्हि आ ओ भारतीय इतिहास कांग्रेसक प्राचीन भारतीय इतिहास शाखाक अध्यक्ष रहल छथि। हुनकर लेखनीमे जे प्रवाह छै से प्रचंड विद्वताक कारणसँ। हुनकर लेखनीमे मिथिलाक आ मैथिलक (मैथिल ब्राह्मण वा कर्ण/ मैथिल कायस्थसँ जे एकर तादात्म्य होअए) अनर्गल महिमामंडन नहि भेटत। हुनकर विवेचन मौलिक आ टटका अछि आ हुनकर शैली आ कथ्य कौशलसँ पूर्ण। एतुक्का भाषाक कोमल आरोह-अवरोह, एतुक्का सर्वहारा वर्गक सर्वगुणसंपन्नता, संगहि एतुक्का रहन-सहन आ संस्कृतिक कट्टरता ई सभटा मिथिलाक इतिहासक अंग अछि। एहिमे सम्मिलित अछि राजनीति, दिनचर्या, सामाजिक मान्यता, आर्थिक स्थिति, नैतिकता, धर्म, दर्शन आ साहित्य सेहो। ई इतिहास साहित्य आ पुरातत्वक प्रमाणक आधारपर रचित भेल अछि, दंतकथापर नहि आ आह मिथिला! बाह मिथिला! बला इतिहाससँ फराक अछि। ओ चर्च करैत छथि जे एतए विद्यापति सन लोक भेलाह जे समाजक विभिन्न वर्गकेँ समेटि कऽ राखलन्हि तँ संगहि एतए कट्टर तत्त्व सेहो रहल। हुनकर लेखनमे मानवता आ धर्मनिरपेक्षता भेटत जे आइ काल्हिक साहित्यक लेल सेहो एकटा नूतन वस्तु थिक ! सर्वहारा मैथिल संस्कृतिक एहि इतिहासक प्रस्तुतिकरण, संगहि हुनकर सभटा अप्रकाशित साहित्यक विदेह द्वारा अंकन (हुनकर हाथक २५-३० साल पूर्वक पाण्डुलिपिक आधारपर) आ ई-प्रकाशन कट्टरवादी संस्था सभ जेना चित्रगुप्त समिति (कर्ण/ मैथिल कायस्थ) आ मैथिल (ब्राह्मण) सभा द्वारा प्रायोजित इतिहास आ साहित्येतिहास पर आ ओहि तरहक मानसिकतापर अंतिम मारक प्रहार सिद्ध हएत, ताहि आशाक संग।-सम्पादक
मिथिलाक इतिहास अध्याय–15
मिथिलाक प्रशासनिक इतिहास
प्राचीन कालमे मिथिला एक एहेन स्थान छल जतए जनक सन शासक छलाह; याज्ञवल्म्य सन विधि विशेषज्ञ एवँ विधिकर्त्ता तथा गौतम सन प्रख्यात नैयायिक। एक ठाम एहेन त्रिरातक जुटब कोनो सामान्य बात नहि अपितु ओहि माँटिक विशेषता कहल जा सकइयै। जनक कालीन मिथिला अपना युगमे राजतंत्रक प्रधान केन्द्र छल मुदा ओ राजतंत्र सब तरहे आदर्श राजतंत्र कहल जा सकइयै आर एकर प्रमाण हमरा उपनिषदसँ भेटइत अछि। अलफातुनक दार्शनिक राजाक कल्पना मिथिलहिमे जनक युगमे साकार भेल छल आर हमर एहि कथनकेँ कोनो रूपेँ अतिशयोक्ति नहि कहल जा सकइयै। बृहदारण्यक उपनिषदसँ ज्ञात होइछ जे राजामे अपन प्रजाक हाल–चाल बुझबाक हेतु बरोबरि अपन राज्यमे भ्रमण करैत रहैत छलाह आर राजाक अहि परिभ्रमणक क्रममे गामक बृद्ध लोकनि राजाक ठहरबाक आर सुख सुविधाक व्यवस्था करैत छलाह। जाधरि राजा अहि प्रकारक यात्रापर रहैत छलाह ताधरि ओ लोकनि राजाक संग रहैत छलाह। गामक मुख्य पदाधिकारी उग्रकर्मासूत कहबैत छलाह आर ओ गामक बृद्धक संग मिलि शासन कार्य चलबैत छलाह। राजा अपन प्रजासँ प्रेम करैत छलाह आर प्रजाक स्थितिक ज्ञान प्राप्त करबाक लेल स्वयं बरोबरि भ्रमणशील रहैत छलाह। उग्रकर्मासूतकेँ पुलिस पदाधिकारी सेहो कहल गेल अछि। प्राचीनकाल ग्यारह रत्निनमे एकटा ‘सूत’ सेहो होइत छलाह आर बादमे इएह इतिहासकारक काज सेहो करए लागल छलाह। जनक कालीन मिथिलामे हिनक मुख्य काज ग्रामीण शासन व्यवस्थाकेँ सुदृढ़ बनाके राखब आर जनताक कल्याणपर ध्यान देब। एतबा सब किछु होइतहुँ ताहु दिनमे अकाल पड़ैत छल आर जनकक समयमे अनावृष्टिक कारणे अकाल पड़ल छल जाहिमे जनककेँ स्वयं हर जोतए पड़ल छलन्हि।
वैदिक कालमे मिथिलामे राजतंत्रिय व्यवस्था छल आर वंशानुगत राजतंत्र प्रणालीक जड़ि जमि चुकल छल। पवित्रताक भावना राजा लोकनिकेँ रहैत छलन्हि। राजा लोकनि शक्तिशाली होइत छलाह। राजदरबारमे ब्राह्मणक प्रधानता छल आर संगहि सेनापति आर रथकार सेहो रहैत छलाह। एतरेय ब्राह्मणक अनुसार ककरोसँ कोनो काज लेब राजाक विशेषाधिकार बुझल जाइत छल। राजा समस्त मानवक एक मात्र शासक मानल जाइत छलाह आर ओहिमे जे गैरजबाब देह होइत छलाह हुनका प्रजाक भोक्ता काल जाइत छल। जनप्रिय राजा लोकनिकेँ देवक संज्ञा भेटइत छलन्हि। ब्राह्मण साहित्यमे राजा जनककेँ सम्राट सेहो कहल गेल छन्हि। राजा जनकक समयमे राजतंत्र मिथिलामे चरमोत्कर्षपर छल। अत्याचारी राजापर अंकुश रखबाक हेतु प्राचीन मनीषि लोकनि अधिकाधिक नियम बनौने छलाह। राज्याभिषेकक अवसरपर जे शपथ ग्रहण होइत छल ताहिमे राजाकेँ ई प्रतिज्ञा करए पड़ैत छलन्हि जे ओ अपना प्रजाक हेतु किछु उठा नहि रखताह। राज्यमे सूत, ग्रामणी आर अनान्य अधिकारी वर्गक बड्ड महत्व छल आर राजाक निर्वाचनमे इएह लोकनि सर्वेसर्वा होइत छलाह। तैं तँ शतपथ ब्राह्मणमे हिनका लोकनिकेँ “राजकृत” सेहो कहल गेल छन्हि। वैदिक युगमे विदथ, सभा आर समितिक उल्लेख सेहो भेटैछ। विदथ बड्ड बड्ड पुरान संस्था छल आर मिथिलामे एकर प्रचलन छलैक अथवा नहिसे कहब असंभव। सभा समिति प्राचीन वैदिक वैधानिक संस्था छल आर एहि माध्यमसँ राजापर अंकुश राखल जाइत छल। गिलगिटसँ प्राप्त बौद्ध पाण्डुलिपिमे एहिबातक उल्लेख अछि जे मिथिलाक राजाक ओतए ५००अमात्य रहैत छलाह जाहिमे ‘खण्ड’ अमात्य अग्रगण्य छलाह। खण्ड शक्तिशाली अमात्य छलाह आर समस्त मिथिला राज्यमे हुनक धाक जमल छलहि। खण्डक वक्तव्यसँ ई स्पष्ट अछि कि जखन वैशालीमे गणराज्यक स्थापना भऽ चुकल छल तखनो मिथिलामे राजतंत्र प्रतिष्ठित राजनैतिक व्यवस्था छल। महाउम्मग्गजातकसँ ई ज्ञात होइत अछि जे मिथिलामे राजा विदेहक ओतए केवट नामक एकटा प्रधानमंत्री छलाह। मिथिलापर एकबेर जखन उत्तर पाँचाल दिसिसँ आक्रमण भेल छल तखन मिथिलाक रक्षार्थ केवट किछु उठा नहि रखने छलाह। केवटक कथा विशद विश्लेषण जातक कथामे भेटैत अछि। कराल जनकक कुकृत्यसँ तंग भए मिथिलाक जनता राजतंत्रक जूआकेँ उठा फेकलक आर ओहि स्थानपर वैशालीक देखादेखी गणतंत्रक स्थापना केलक। किछु दिनक पश्चात् विदेह गणराज्य अपन सुरक्षार्थ वैशालीक गणराज्यसँ मिलि जुलिकेँ रहए लागल आर वज्जीसंघ प्रमुख सदस्य सेहो भऽ गेल।
वैशालीक गणराज्य शासन पद्धति :- वैशालीक लिच्छवी लोकनिक शासन गणतांत्रिक छल। राज्यक शक्ति जनतामे निहित छल। कौटिल्य लिच्छवी लोकनिक हेतु ‘राजशब्दोपजीवीसंघ’क व्यवहार कएने छथि। ‘ललितविस्तार’क अनुसार वैशालीक प्रत्येक व्यक्ति अपना सम्बन्धमे इएह बुझैत छल जे ओ राजा अछि। केओ अपनाकेँ ककरोसँ छोट नहि बुझैत छलाह। ओहिठामक राज्यशक्ति समूहमे निहित छल। शासक राज्यक सेवक बुझल जाइत छलाह। परिषदक बैसक जाहि भवनमे होइत छल तकरा ‘संथागार’ कहल जाइत छल। संथागारेमे बैसिकेँ सब केओ राजनैतिक आर सामाजिक प्रश्नपर विचार विमर्श करैत जाइत छलाह। परिषदक स्भापति अथवा गणमुख्य सेहो राजा कहबैत छलाह। वैशालीमे ७७०७राजाक उल्लेख भेटैत अछि। संभवतः ई सब गोटए कुलीन परिवारक छलाह आर शासन सत्ता हिनके लोकनिक मध्य निहित छल। इएह कारण अछि जे वैशालीक शासनकेँ कुलीनतंत्र सेहो कहल गेल अछि।
आजुक संसद जकाँ ताहि दिनक संथागारमे सेहो सबटा कार्य नियमानुसार होइत छल। सदस्य लोकनिक बैसबाक प्रबन्धकेँ आसन कहल जाइत छल अर परिषदक कार्यवाहीक हेतु निश्चित गणपूर्त्ति करेनिहार पदाधिकारीकेँ गणपूरक कहल जाइत छल। परिषदमे उपस्थित प्रस्तावकेँ प्रतिज्ञा कहल जाइत छल। प्रस्तावपर बाद विवाद होइत छल आर तकर बाद ओहिपर मत लेल जाइत छल। मतकेँ गुप्त राखल जाइत छल आर पारित प्रस्तावकेँ सबकेम मानए पड़ैत छलन्हि।
गणक मुख्य अधिकारी होइत छलाह राजा, उपराजा, सेनापति, भांडागारिक इत्यादि आर सेना, अर्था आर न्याय शासनक मुख्य अंग छल। बौद्ध साहित्यमे हिरण्यक, सारथी आदि कर्मचारीक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। नायक नामक एक पदाधिकारीक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। न्याय विभागक अधिकारीकेँ विनिमय महामात्य कहल जाइत छल। अभियुक्तकेँ सर्वप्रथम हिनके समक्ष उपस्थित कैल जाइत छल आर अहिठाम सर्वप्रथम आरोपक जाँच होइत छल। निरपराध भेलापर अपराधीकेँ मुक्त कऽ देल जाइत छल आर अपराध सिद्ध भेलापर पुनः ओकरा व्यावहारिक अथवा वोहारिक महामात्यक समक्ष उपस्थित कैल जाइत छल। निरपराध सिद्ध भेलापर अपराधी मुक्त कऽ देल जाइत छल अन्यथा ओकरा पुनः अट्ठकुलकक समक्ष उपस्थित कैल जाइत छल। क्रमशः अभियुक्तकेँ सेनापति, उपराजा आर राजाक समक्ष उपस्थित कैल जाइत छल। अभियुक्तकेँ दण्ड तखने देल जाइत छल जखन ओकर अपराध पूर्णतया सिद्ध भऽ जाइछ। समस्त न्याय प्रणालीक रिकार्ड राखल जाइत छल जकरा ‘पवेणीपुस्तक’ कहल जाइत छलैक। न्याय व्यवस्था समता आर स्वतंत्रताक सिद्धांतपर आधारित छल। अपील करबाक व्यवस्था सेहो छल।
नगर व्यवस्थाक भार नगर गुत्तिकपर रहैत छल। नगरमे शांति स्थापनाक दायित्वक भार ओहि पदाधिकारीपर छलैक। नगर गुत्तिककेँ रातिक राजा सेहो कहल जाइत छलैक।
अहिठाम ई स्मरण रखबाक अछि जे वैशाली लिच्छवी संघक राजधानी छल आर संगहि वृज्जि गणसंघक सेहो तैं वैशालीक अत्यधिक महत्व बौद्धयुगमे भगेअ छल। विदेह आर लिच्छवी संयुक्त रूपसँ संवज्जि कहबैत छलाह आर वृज्जिसंघ आठटा गणराज्य सम्मिलित छल। कल्पसूत्रक अनुसार लिच्छवीक एहेन सम्बन्ध एकबेर मल्लक संग सेहो छल आर ई दुनु गोटए मिलिकेँ एकबेर संयुक्त परिषदक निर्माण केने छलाह जाहिमे १८सदस्य छलाह–९लिच्छवी आर ९मल्ल। इहो लोकनि राजा कहबैत छलाह। साम्राज्यवादी आक्रमणक प्रकोपसँ बचबाक हेतु ई लोकनि समय–समयपर अपन संघ बनबैत छलाह। वैशाली सबमे प्रमुख छल तैं सब छोट–छोट, गणराज्य वैशालीक संग मिलिकेँ संघ बनेबाक हेतु उत्सुक रहैत छल। वृज्जिसंघ शासनकेम परामर्श देबाक हेतु एक संस्था छल अष्टकुलक जाहिमे आठो गणक प्रतिनिधि रहैत छलाह। संघक सब सदस्यक अधिकार बरोबरि छलन्हि। उच्चतम न्यायालयकेँ अष्टकुलक कहल जाइत छल। संघ शासन प्रणालीक अपन नियम छल जाहिसँ संघ शासन संचालित होइत छल। वैशाली ताहि दिनमे सर्वश्रेष्ठ संघ राज्यक केन्द्र छल।
बुद्ध वैशाली गणतंत्रक मतैक्य, सौहार्द, आदर, दृढ़ता, पराक्रम आदिक भावनासँ बड्ड प्रभावित छलाह आर बेर–बेर वैशाली अवैत रहैत छलाह। बुद्धक अनुसार जे गणराज्य निम्नलिखित सातटा आदर्शक (सप्तअपरिहाणिसुत) पालन करैत रहत तकर कहिओ ह्रास नहि हेतैक–
- i) नियमित एवँ व्यवस्थित रूपें सदति सभाक आयोजन करब–
- ii) विचार, उत्थान एवँ व्यवहारमे सदस्यक मतैक्य रहब–
- iii) व्यवह्रत सिद्धांतक प्रयोग करब–
- iv) बृद्ध लोकनिक प्रति आदर, श्रद्धा, सहयोग एवँ प्रतिष्ठाक भाव राखब–
- v) संघक चैत्यक प्रति श्रद्धा एवँ सहयोगक भावना राखब–
- vi) पराजित देशक स्त्रीक संग उचित व्यवहार करब–
- vii) अर्हत् क प्रति समुचित सहयोग एवं रक्षाक भावना राखब–
महापरिनिर्वाणसुतसँ ज्ञात होइछ ज वृज्जीसंघक शासन व्यवस्थामे–
- i) विभिन्न संघक सभाक अधिवेषन बरोबरि नियमित रूपेँ होइत रहैत छल–
- ii) वृज्जीसंघक सदस्य लोकनि बरोबरि आपसमे मिलैत–जुलैत रहैत छलाह आर शासन चलेबा सतर्कताक परिचय दैत छलाह।
- iii) ओ लोकनि अपन परम्परागत नियमक पालनक प्रति जागरूक रहैत छलाह।
- iv) शासनमे बुझनुक बृद्ध लोकनिक हाथ रहए दैत छलाह।
वैशालीमे कोना आर कहिया गणराज्यक स्थापना भेल से कहब असंभव। बुद्ध तँ लिच्छवी लोकनिक प्रशंसा ‘तावतिंश देव’ कहिकेँ केने छथि आर ओ स्वयं गणशासन प्रणालीसँ एतेक प्रभावित भेल छलाह जे ओ एहि प्रणालीकेँ अपन संघ संगठनक आदर्श मानलन्हि। ७७०७राजा ओहिठाम राजकुलोद्भव मानल जाइत छलाह आर ओहिना व्यवहारो करैत छलाह। वैशालीक पुष्करिणी हिनके लोकनिक हेतु सुरक्षित रहैत छल। ई लोकनि वैशालीक एकविशिष्ट क्षेत्रसँ संबन्धित छलाह। जैन कल्पसूत्रसँ इहो स्पष्ट होइछ वैशाली शासनक एकटा कार्यकारिणी समिति सेहो छल। वैशाली सन प्राचीन न्यायवस्थाक कोनो दोसर उदाहरण संसारमे नहि भेटैत अछि। अभियुक्तकेँ तखने दण्डित कैल जा सकैत छल जखन ओ क्रमशः सातो न्याय समितिसँ एकमतसँ दण्डित घोषित हुए। वृज्जीसंघक शासनमे सेहो समानताक सिद्धांतक पालन होइत छल। अजातशत्रुक आक्रमणक बादो जखन वैशाली मगध साम्राज्यक अंग बनि गेल तखनो एकर गणतांत्रिक स्वरूप अपना क्षेत्रमे बनले रहल। मौर्य युगसँ वैशाली–विदेह मौर्य साम्राज्यक एकटा अंग बनिकेँ रहल। अशोकक समयमे वैशालीआर चम्पारणक प्रशासनिक महत्व बढ़ल होइत कारण अहि दुहुठाम अशोकक स्तंभ अछि। अशोकक स्तंभसँ ई अनुमान लगाओल जाइछ जे प्रशासनिक दृष्टिकोणसँ मिथिलाक महत्व घटल नहि छल अपितु बढ़ले छल। अहि बाते नेपाल जेबाक मार्ग छल तैं प्रशासनिक दृष्टिये सीमासँ सटल वैशाली–विदेह राज्यकेँ सुरक्षित राखब आर ओकरा नीक संबन्ध बनौने राखब साम्राज्यवादी शासकोक अभीष्ट रहैत छलन्हि। वैशालीसँ पुर्णियाँ धरिक सीमा मिथिला प्रांतक अंतर्गत छल आर मिथिला उत्तर बिहारक एकटा प्रमुख प्रशासनिक केन्द्र छल। साम्राज्यवादी छत्रछायाक अंतर्गत रहितहुँ मिथिला अपन प्रजातांत्रिक प्रणालीकेँ सोहागक सिन्दुर जकाँ संजोगने छल। पतञ्जलिक महाभाष्यमे सेहो जतए–ततए मिथिला जनपदक उल्लेख भेटैत अछि। मौर्य साम्राज्यक समाप्त भेलापर वैशाली पुनः अपन स्वतंत्रता प्राप्त केलक से बुझि पड़इयै।
वैशालीक उत्खननसँ जे बहुत रास मोहर सब भेटल अछि ताहिपर श्रेणी, सार्थवाह, कुलिक, निगम आदिक उल्लेख भेटइयै। एहेन बुझना जाइत अछि जे वैशालीमे श्रेष्ठी, सार्थवाह आर शिल्पी लोकनिक सम्मिलित निगम छल आर एहि निगमक काज विभिन्न नगर सबमे पसरल छल। श्रेष्ठी सार्थवाह कुलिक निगमक २७४टा मोहर वैशालीसम भेटल अछि जाहिमे ७५टा ईशानदासक, ३८टा मातृदासक ३७टा गोभिस्वामीक मोहर अछि। संभवतः ई लोकनि निगम शाखाक अध्यक्ष रहल होयताह ठाम–ठाम मोहर सबक अतिरिक्त भगवान, जिन्न, पशुपति आदिक नामएक उल्लेख सेहो भेटैत अछि।
गुप्तकालमे वैशाली तीरभुक्ति प्रांतक राजधानी छल आर ओहिठामसँ प्राप्त मुद्रामे एकरा अधिष्ठान सेहो कहल गेल छैक। एहि प्रांतक महत्व अहुँसँ बुझना जाइत अछि जे स्वयं गोविन्द गुप्त एहि प्रांतक राज्यपाल छलाह आर हुनक एक अभिलेख सेहो अहिठामसँ भेटल अछि।
- महाराजाधिराज श्री चन्द्रगुप्त पत्नी श्री गोविन्द गुप्त माता श्री ध्रुवस्वामिनी–
अहिठामसँ बहुत रास मुद्रा, अभिलेख आदि भेटल अछि। प्रांतीय शासकक रूपमे राजकुलक लोग नियुक्त होइत छलाह। हुनका लोकनिकेँ युवराज कुमारा माअत्य कहल जाइत छलन्हि। प्रान्तीय शासककेँ अपन अपन महासेनापति, महादण्डनायक आर अन्यान्य कर्मचारी होइत छलन्हि। पुण्ड्रवर्द्धन भुक्ति आर तीरभुक्तिक क्षेत्र ताहि दिनक मिथिला प्रांतमे छल। युवराज कुमारमात्यक अधीन भुक्तिक शासनक हेतु उपरिक नियुक्ति होइत छल आर पुण्ड्रवर्द्धन भुक्तिमे करण कायस्थ ‘दत्त’ पदवी धारी ‘चिरात दत्त’क ३–४पुस्त उपरिकक पदपर विराजमान छलाह। उपरिककेँ प्रांतीय शासक अथवा गवर्नर कहल जाइत छल। प्रांतीय शासकक मुख्य कर्त्तव्य निम्नलिखित छल–
- i) शांति–व्यवस्थाकेँ सुरक्षित राखब
- ii) कर वसूलीक व्यवस्थाकेँ सुदृढ़ राखब
- iii) प्रजाक रक्षा करब
- iv) सुख–समृद्धिक प्रबन्ध करब
- v) राजाक प्रति प्रजामे बिश्वास उत्पन्न करब
- vi) सीमावर्त्ती राज्यक आक्रमणसँ अपन क्षेत्रकेँ सुरक्षित राखब।
गुप्तकालमे प्रादेशिक शासक लोकनिक सभक सोझे राजासँ छलन्हि। सामंतवादक विकास अहियुगमे प्रारंभ भऽ चुकल छल आर एकर प्रभाव शासनपर पड़ब स्वाभाविके चल। उत्खननसँ प्राप्त सामग्रीक आधारपर प्रांतीय शासनसँ सम्बन्धित निम्नलिखित कर्मचारीक विवरण भेटइत अछि।
उपरिक, कुमारपालाधिकरण, (राजकुमारक मंत्रीक कार्यालय), बलाधिकरण(सेनापतिक कार्यालय), दण्डपाशाधिकरण, (पुलिस अधिकारीक कार्यालय), महादण्डनायक (प्रमुख न्यायाधीश), विनय स्थिति स्थापक (कानून आर व्यवस्था मंत्री)
गुप्तकालमे केन्द्रीय शासनक विभिन्न विभागकेँ अधिकरण कहल जाइत छलैक आर एक प्रकारक राष्ट्रीय सेवाक प्रावधान सेहो छलैक। जकरा ‘कुमारामात्य’ कहल जाइत छलैक। ‘कुमारामात्य’ साम्राज्यक शासन प्रणालीक स्थायी सेवामे रहैत छलाह आर हुनका कतहु कोनो काजमे पठाओल जा सकैत छल। ओ लोकनि प्रशासनिक सेवाक सदस्य होइत छलाह। कवि हरिषेण सेहो अपनाकेँ कुमारामात्य कहने छथि। कुमारामात्यकन सम्बन्ध प्रांतीय आर स्थानीय शासनसँ सेहो रहैत छल। वैशालीसँ प्राप्त सूचना प्रशासनिक सम्बन्धमे एवँ प्रकारे अछि।
- i) कुमारामात्यधिकरणस्य–
- ii) युवराज पादीयकुमारामात्यधिकरण–
- iii) परमभद्दारक पादीय कुमारामात्यधिकरण–
- iv) –वालाधिकरणस्य–
- v) रण भाण्डागारिधिकरणस्य–
- vi) दण्डपाशाधिकरणस्य–
- vii) तीरभुक्तौपरिक्रमधिकरणस्य–
- viii) तीरभुक्तौ विनय स्थिति स्थापकाधिकरणस्य–
- ix) तीरभुक्तौ कुमारामात्यधिकरणस्य–
- x) वैशालयाधिष्ठानाधिकरण–
भुक्तिक अधीन विषय (जिला) होइत छल। विभिन्न श्रोतसँ ई ज्ञात होइत जे पाल
युग धरि अवैत–अवैत तीरभुक्तिमे चामुण्डा, होद्रेय, कक्ष विषय छल आर नौलागढ़सँ प्राप्त अभिलेखक अनुसार एक ‘रक्षमुक्त विषयाधिकरण’ नामक सेहो एकटा प्रशासनिक केन्द्र छल। विषयमे पादितारिक आर गौल्मिक नामक अधिकारी होइत छलाह। अक्षपटलाधिकृत गामक जमीनक लेखा–जोखा रखैत छलाह। विषयमे चारि सदस्यक एकटा परामर्शदातृ समिति सेहो होइत छल जाहिमे नगर श्रेष्ठी, सार्थवाह, प्रथमकुलिक आर प्रथमकायस्थ सदस्य होइत छलाह। विषयपति अपन जिलाक प्रमुख व्यक्तिक संग मिलिकेँ शासन करैत छलाह। वैशालीमे नगर शासन स्थानीय निगमक हाथमे छल।
अहिठाम पुण्ड्रवर्द्धन–पुर्णियाँ (जे कि पूर्वी मिथिलाक अंश रहल अछि) किछु कहिदेव आवश्यक। प्राचीन कालहिसँ प्रशासनिक, सामरिक आर साँस्कृतिक दृष्टिकोणसँ पुर्णियाँक महत्व रहल अछि आर मिथिलाक सुरक्षा सेहो पुर्णियाँक सुरक्षासँ सम्बद्ध मानल गेल अछि। गुप्तलोकनि पूर्वी प्रदेशपर अपन नियंत्रण रखबाक हेतु अहिठाम अपन शासनक एक प्रमुख केन्द्र बनौने छलाह। कनिघंमक अनुसार वैशालीक वृज्जीसंघ सेहो एहि प्रदेश अपन नियंत्रण रखैत छलाह। पुण्ड्रवर्द्धन भुक्तिक समीकरण पुर्णियाँसँ करब अत्यंत स्वाभावित बुझना जाइत अछि। अभिलेखमे कोकामुखस्वामी आर स्वेतवाराहस्वामी उल्लेख भेटइत अछि जे नेपालक धनकुट्टा नामक स्थान लग अछि आर पुर्णियाँ जिलाक अभ्यंतर सेहो। बादमे जे आर अभिलेख सबमे वराहक्षेत्र किंवा ‘पुण्ड्र’क उल्लेख भेटैछ से सब पुर्णियाँक संकेत दैत अछि। पुर्णियाँक प्रशासनकेँ नियंत्रणमे राखब अहुलेल आवश्यक छल कारण पुर्णियाँक सीमा नेपाल, असम, बंगालसँ मिलैत छल। पुण्ड्रवर्द्धन भुक्ति बंगाल–बिहारक पूर्वी अंश मिलाकेँ छल आर पुर्णियाँ ओकर प्रमुख केन्द्र छल।
हर्षक शासन कालमे सेहो मिथिलाक प्रधानता बनल रहल। राज्यसत्ताक कमजोरीक कारणे राजतंत्रक विकेन्द्रीकरण भए गेल छल आर हर्षक मृत्युक पश्चात् तिरहूतमे अराजकता पसरि गेल छल जे लगभग ५०वर्ष धरि बनल रहल। दोसर बात इहो जे अहियुगमे सामंतवादी प्रवृत्ति दृढ़ता भेल आर शासनयंत्रमे एकर प्रभाव स्पष्ट होमए लागल। चीनी यात्री हियुएन संग सेहो एहि बातक समर्थन केने छथि। हर्षक शासनक मुख्य आधार छल व्यक्तिगत भ्रमण एवँ निरीक्षण आर तैं हर्षक परोक्ष भेलापर शासन यंत्र एकदम ढ़ील भऽ गेल आर चारूकात सब केओ अपन–अपन हाथ–पैर पसारे लगलाह। तहियासँ लकए पाल शासनक स्थापना धरि एक प्रकारक अस्थायित्व बनल रहल आर मिथिलाक क्षेत्रपर चारू दिसिसँ आक्रमण होइत रहल। एहि अराजकताक कालोमे तीरभुक्ति एक प्रमुख प्रांत छल आर उत्तर गुप्त शासक लोकनिक मुख्य शासन केन्द्र सेहो जकर प्रमाण हमरा कटरासँ प्राप्त ताम्रलेखसँ भेटैत अछि। कटरा (मुजफ्फरपुर)सँ प्राप्त जीवगुप्तक अभिलेखमे तीरभुक्तिक चामुण्डा विषयक आर तिष्टिहल पाटकक उल्लेख भेटैत अछि। तारा नामक स्थानसँ ई तँ मान्य देल गेल छल आर ओहिमे सुरभकार, याम्या आर हरिग्रामक नामक गामक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। एहि ताम्रलेखमे निम्नलिखित शासनाधिकारीक वर्णन अछि–
- i) महासन्धि विग्रहिक
- ii) अक्षपटालिक
- iii) सर्वाधिकाहिक
- iv) प्रतिहार
- v) सेनापति आर
- vi) महासामंत–
पालयुगमे तीरभुक्ति एकटा प्रधानकेन्द्र छल। ओनातँ नारायन पाल भागलपुर ताम्रलेखमे तीरभुक्तिक कक्ष (कौशिकी–कच्छ=छै परगना) विषय आर गाम सबहिक वर्णन भेटिते अछि मुदा तिरहूतक केन्द्र वनगाँवसँ जे ताम्र अभिलेख (विग्रट पाल तृतीयक) भेटल अछि ताहुसँ तीरभुक्तिक शासनपर प्रकाश पड़इयै। पालकालमे जखन कलचुरी वंशक आक्रमणक प्रकोप बढ़ल तखन पल लोकनि अपनाकेँ समेटकेँ तीरभुक्तिमे सुरक्षित रखलन्हि आर एवं प्रकारे अपन साम्राज्य आर प्रतिष्ठाकेँ वचौलन्हि। मिथिला भौगोलिक दृष्टिये सुरक्षित छल तै ओ लोकनि एम्हरे दासकिकेँ एलाह। वनगाँवक अभिलेखसँ ज्ञात होइछ जे तीरभुक्तिमे हौद्रेय (आधुनिक हरदी गाँव सहरसा) विषय सेहो छल। गुप्तयुगसँ कर्णाटवंशक स्थापना धरि तीरभुक्ति शासनज्क एकटा प्रधान केन्द्र बनल रहल। ११म शताब्दीक दूटा अभिलेख चम्पारणसँ हालहिमे उपलब्ध भेल अछि जाहिसम ताहि दिन शासन प्रणालीपर किछु प्रकाश पड़इयै। गोरखपुरसँ चम्पारण ध्रिक क्षेत्रकेँ दरदगण्डकीवंश कहल जाइत छल आर प्रशासनिक इकाईक हिसाबे दरद–गण्डकी–मण्डल जकरा अधीनमे विआलिसि विषय (४२ग्राम) छल। एहि लेखसँ ई स्पष्ट अछि जे अहिठाम विषय मण्डलक एकटा छोट अंग मानल गेल अछि। चम्पारणक ई दुनुटा अभिलेख कर्णाटक पूर्वथिक आर प्रतिहार लोकनिक सत्ताक कमजोर भेलापर ई लोकनि संभवतः एहि क्षेत्रपर अपन सत्ता स्थापित केने छलाह। एहि दुनु अभिलेखमे निम्नलिखित प्रशासनिक शब्दावली भेटइत अछि।
i) राणक, ii) ठाकुर, iii) अमात्य, iv) पुरोहित, v) महामत्तक, vi) महासन्धिविग्रहिक, vii) महाप्रतिहार, viii) महाक्षपटलिक, ix) महासाधनिक, x) महापीलुपति, xi) महासेनापति, xii) महाकटकाध्यक्ष, xiii) दुष्टसाध्यासाधनिक, xiv) दाण्डिक, xv) दण्डपाशिक, xvi) शौल्किक, xvii) गौल्किक, xviii) दूतसंप्रेषणिक, xix) तलवर्गिक, xx) अंगरक्षक, xxi) चाट–भाट,–इत्यादि–
एहिमे वर्णित बहुत रास शब्दावली पाल अभिलेखमे सेहो भेटल अछि। एहि अभिलेखसँ इहो अनुमान लगाओल जाइछ जे मिथिलाक सीमा पश्चिममे श्रावस्ती भुक्तिसँ पश्चिमोत्तरमे दरद–गण्डकी–देशसँ आर पूबमे पुण्ड्रवर्द्धन भुक्तिसँ मिलल जुलल छल। एवँ प्रकारे स्मस्त उत्तर बिहारक प्रतिनिधित्व प्राचीन कालक तीरभुक्ति करैत छल आर अहि दृष्टिकोणे एकर प्रशासनिक महत्व अद्वितीय छलैक जे मुगलकाल धरि बनल रहलैक। उत्तरमे कर्णाट लोकनि सिमरौन गढ़ धरि बढ़ले रहैत आर ओतए अपन राजधानी बनौने रहैत। ग्राममे ग्राम पंचायतक व्यवस्था छल आर अभिलेख सबमे पञ्चमण्डली आर पञ्चकुलक उल्लेख भेटैत अछि।
१०९७मे जखा कर्णाटवंशक स्थापना भेल तखन पुनः शासन व्यवस्थाक संगठन मिथिलाक आवश्यकताक अनुकूल गठित भेल यद्धपि एकर आधार छल सामंतवादी व्यवस्था। नान्यदेव अहिठामक शासन व्यवस्थाकेँ सुगठित केलन्हि आर मिथिलाक निजीगौरव एवँ विशिष्टताक विकास सेहो। नान्यदेव स्वयं कर्णाट वंशक संस्थापक छलाह तैं शासनमे हुनक प्रधानता रहब स्वाभाविके। शासकक प्रधान राजा होइत छलाह। प्रजाक रक्षा करब उचित बुझल जाइत छल–चण्डेश्वरतँ प्रजाकेँ विष्णु कहने छथि। राजा शासन, न्याय एवँ प्रशासनिक यंत्रक अध्यक्ष होइत छलाह। शासनकेँ सुरूचिपूर्ण ढ़ँगसँ चलेबाक हेतु राजा बरोबरि प्राचीन परम्परा एवम मान्यताकेँ ध्यानमे रखैत छलाह। शासकक संगहि संग मिथिलाक राजा प्रसिद्ध विद्वानो होइत छ्लाह आर उदाहरणस्वरूप हमरा लोकनि नान्यदेव, रामसिंह देव, शिवसिंह, लखिमा, विश्वास देवी आदिक नाम लऽ सकैत छी। राजा लोकनि परमेश्वर, परमभद्दारक, महाराजाधिराज, महानृपति, क्षितिपाल, भूपाल, मिथिलाधिपति, भूजवल भीम, भीमपराक्रम, कर्णाटचूड़ामणि, दशमदेव अवतार; एकादश अवतारा, भूमिपति, मुकुटमणि, आदि पदवीसँ विभूषित होइत छलाह। नान्यदेव, गंगदेव, रामसिंहदेवक शासन धरि तँ कोनो प्रकारक गोलमाल देखबामे नहि अवइयै परञ्च शक्तिसिंहदेवक शासनकालमे मंत्री लोकनि शासन सत्ता अपना हाथमे लऽ लेने छलाह। सामंते मंत्री होइत छलाह। शक्तिसिंहक कठोर शासनस ओ लोकनि उबि गेल छलाह तैं हुनकासँ सब अधिकार छीनिके अपना हाथमे लऽ लेलन्हि। मंत्रियेक संरक्षणमे बहुत दिन धरि हरिसिंह देव नाम मात्रक शासक छलाह सामंतवादी व्यवस्थाक फलें राजाक शक्तिक्षीण अवश्य भेल छल मुदा शक्तिशाली शासक अपन अधिकारक उपयोग कइये लैत छलाह। हरिसिंह देव, शिवसिंह देव, भैरव सिंह देव आदि शासक एकर उदाहरण छथि। सामान्यतः राजाकेँ सामन्तक बलपर निर्भर करए पड़ैत छलन्हि।
राजकेँ सहायता देबाक हेतु मंत्रिपरिषदक व्यवस्था सेहो छल। मिथिलामे प्रधानमंत्रीकेँ महामत्तक कहल जाइत छल। अन्हराठाढ़ी आर हावीडीह अभिलेखमे प्रधानमंत्री लोकनिकेँ मंत्रीक नामसँ सार्बाधित कैल गेल अछि। मंत्री लोकनिकेँ संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैकीभाव, आर संश्रयक पूर्णज्ञान रहब आवश्यक बुझना जाइत छल। श्रीधरदास एवँ रत्नदेवक वंशज मिथिलामे बहुतो दिन धरि मंत्री पदक भार सम्हारने छलाह। श्रीधरदासकेँ सेन वंश दिसिसँ महामण्डलिकक पदवी भेटल छलन्हि। रत्नदेवक वंशजकेँ सामंतवादी पदवी ‘रउत’ रहैन्ह आर विद्यापतिमे रत्नदेवक वंशज रउत रजदेवक उल्लेख अछि। रामादित्य, कर्मादित्य, वीरेश्वर, देवादित्य, गणेश्वर, चंडेश्वर आदि सेहो प्रमुख मंत्रीगण मिथिलामे भेल छथि। शक्तिसिंहक निरंकुश शासनसँ जखन मंत्रीगण उबि गेल छलाह तखन ओ लोकनि सात बृद्धक एकटा परिषद बनौलन्हि आर शक्तिसिंहकेँ गद्दीसँ उतारि ओहि परिषदक हाथमे शासन भार देलन्हि। एहिसँ मंत्रिपरिषदक व्यापकता एवँ अधिकारक पता लगइयै। पाछाँ जखन हरिसिंह देव वयस्क भेला तखन हुनक राज्याभिषेक भेल। ताहिसँ पूर्व संभवतः चण्डेश्वर राज्यक भार सम्हारने छलाह। चण्डेश्वर साँधि विग्रहिक छलाह। हुनका महावर्त्तिक नैबन्धिक सेहो कहल गेल अछि। एहिसँ प्रत्यक्ष अछि जे चण्डेश्वर बड्ड शक्तिशाली मंत्री छलाह। मंत्री लोकनि सामंत, महासामंत, मांडलिक, महामाण्डलिक, महाराज, महामतक आदि पदवी एवँ उपाधिसँ विभूषित होइत छलाह। ई लोकनि हृदयसँ दान इत्यादि सेहो करैत छलाह आर एहि दिशामे वीरेश्वर आर चण्डेश्वरक नाम अग्रगण्य अछि। चण्डेश्वरक अधीन जे एकटा सामन्त हरिब्रह्म छलाह तिना एकटा पद प्राकृत पैगंलम् मे सुरक्षित अछि। मंत्रिपरिषदक अतिरिक्त आरो कतैक पदाधिकारी होइत छलाह जेना–
i) महामुद्राधिकृत
ii) महासर्वाधिकृत
iii) महाधर्माध्यक्ष
iv) धर्माध्यक्ष
v) प्राड् विवाक
vi) कोषाध्यक्ष
vii) स्थानांतरिक इत्यादि।
ग्राम शासनक न्यूनतम इकाई छल। ग्रामक अध्यक्षकेँ ग्रामपति कहल जाइत छल। ग्रामपति कर वसूल कए राजाक ओतए पठबैत छलाह। गुल्म सेहो एकटा ग्राम पदाधिकारी होइत छलाह। तीन अथवा पाँचटा ग्रामकेँ मिलाकेँ एकटा गुल्म नियुक्त होइत छलाह। एकर अतिरिक्त दश ग्रामपति, विंशति संग्रामपति, त्रिंशति ग्रामपति, सहस्त्र ग्रामपति, इत्यादिक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। प्रत्येक ग्राममे एकटा मुखिया होइत छल। केन्द्रीय शासन ग्राम शासनक सफलतापर निर्भर करैत छल। ग्राम सभामे राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, आर साँस्कृतिक आदि विषयपर विचार विमर्श होइत छल। ग्रामक झगड़ा दान ग्राम सभामे फरियैल जाइत छल। जखन ग्राम सभा फरियैबामे असमर्थ होइत छल, तखने उपरका अधिकारीक ओतए ओ पठाओल जाइत छल। मिथिलाक समस्त राजनैतिक संगठनक आधारशिला छल ग्राम सभा। ग्राम सभाक पदाधिकारीकेँ पारिश्रामिक भेटैत छलन्हि जकर विवरण निम्नाकिंत अछि–
i) दशेश–दश गामक अधिकारीकेँ जोतबाक हेतु ओतेक जमीन भेटैत छलन्हि जतेक ओ एकहरसँ स्वयं जोति सकैत छलाह।
ii) विशंतिश–बीस गामक अधिकारीकेँ चारिटा हरसँ स्वयं जोति सकबा जोकर जमीन भेटैत छलन्हि।
iii) सतेश–एक सौ गामक अधिकारीकेँ एकटा सम्पूर्ण गामे भेटइत छलन्हि।
iv) सहसाधिपति–एक हजार अधिकारीकेँ एकटा सम्पूर्ण नगर भेटइत छलन्हि।
ग्राम शासन संगठनक प्रसंगमे गंगदेवक नाम अग्रगण्य अछि। मिथिलामे एकर सर्वश्रेष्ठ श्रेय हुनके चन्हि। ओ समस्त मिथिला राज्यकेँ राजस्व प्रशासनक दृष्टिकोणसँ कतेको परगनामे बटने छलाह आर प्रत्येक परगनाक हेतु चौधरी आर कोतवाल नियुक्त केने छलाह। इएह लोकनि ग्राम शांति आर राजस्व वसूलीक हेतु उत्तरदायी होइत छलाह आर हिनके लोकनिक योग्यता आर सहयोगपर केन्द्रीय शासनक सफलता निर्भर करैत छल। ग्राम शासन आर केन्द्रीय शासनक मध्य सम्पर्क स्थापित करबाक हेतु आर ओकरा बनाकेँ रखबाक हेतु एक प्रकारक विशेष कर्मचारी होइत छलाह जकरा ‘स्निग्ध’ कहल जाइत छल। ‘स्निग्ध’केँ ग्राम विभागक मंत्रियो कहि सकैत छी। यदा कदा ‘स्निग्ध’क स्वार्थपूर्ण आचरणसँ ग्रामीण तबाहो होइत छलाह। ‘स्वार्थ चिंतकम्’ नामक एकटा अधिकारी आर होइत छलाह जिनका ग्रामीण लोकनि ‘राहु’ बुझैत छलथिन्ह। ग्राममे पंचायतक चुनावे जनतांत्रिक पद्धतिसँ होइत छल आर मिथिलामे एकर परम्परा बड्ड प्राचीन छल। प्रत्येक गामक हेतु पुलिस (आरक्षी)क नियुक्ति सेहो होइत छल। प्रत्येक दिन पुलिस लोकनिकेँ अपन काजक ब्योरा गामक मुखियाकेँ देमए पड़ैत छलन्हि। जँ कतहु कोनो गड़बड़ी भेल तँ ओहि हेतु पुलिसकेँ उत्तरदायी ठहराओल जाइत छल।
मिथिलाक अभिलेख आर प्राचीन पोथी सबमे बहुत रास प्रशासनिक शब्दावली भेटैत अछि जाहिसँ बुझि पड़इयै जे ओ सब ताहि दिनमे व्यवहारमे छल। संग्रामगुप्तक पंचोभ ताम्रलेख(१३म शाताब्दी)मे निम्नलिखित अधिकारीक विवरण भेटइत अछि–
i) महाराजा धिराज– वर्णनरत्नाकरमे–
ii) महामाण्डलिक– i)भूपाल–
iii) महासन्धि विग्रहिक– ii)माण्डलिक–
iv) महाव्युहपि– iii)सामन्त–
v) महाधिकारिक– iv)सेनापति–
vi) महामुद्राधिकारिक– v)पुरपति–
vii) महामतक– vi)मंत्री–
viii) महासाधनिक– vii)पुरोहित–
ix) महाकटुक– viii) धर्माधिकरण–
x) महाकरणाध्यक्ष– ix) सान्धि विग्रहिक–
xi) वातिनैबन्धिक– x) महामत्तक–
xii) महादण्डनायक– xi) प्रातबलकरणाध्यक्ष–
xiii) महापंचकुलिक– xii) शांतिकरणिक–
xiv) महासामन्त राणक– xiii) दुर्गपाल–
xv) महाश्रोष्ठि दानिक– xiv)राजगुरू–इत्यादि–
xvi) गुल्मपति–
xvii) खण्डपाल–
xviii) नरपति–
xix) महौथिक–
xx) महाधर्माधिकरणिक–
इत्यादि–
चण्डेश्वरक राजनीति रत्नाकर:- भारतीय राजनैतिक विचारधाराक विकासक इतिहासमे मिथिलाक चण्डेश्वरक स्थान अग्रगण्य अछि। ओनातँ भारतमे राजनीति शास्त्रपर प्राचीन कालहिसँ ग्रंथ लिखल जा रहल अछि आर एकर प्रमाण हमरा महाभारत, शुक्र, उकानस आर कौटिल्य तथा कामन्दकमे भेटइत अछि। एहिमे कौटिल्यक ग्रंथ सर्वश्रेष्ठ अछि आर पाछाँ सब केओ ओकरे–अनुकरण केने छथि। चण्डेश्वर ग्रंथ राजनीति रत्नाकरमे सब पूर्वाचार्यक मत उद्धत अछि।
मध्ययुगीन विचारकमे चण्डेश्वरक नाम विशेष रूपें उल्लेखनीय अछि। ओ एक संभान्त, प्रतिष्ठित एवँ विद्वान परिवारमे जन्म ग्रहण केने छलाह। ओ देवादित्यक पौत्र आर वीरेश्वरक पुत्र छलाह आर ई तीनु गोटए कर्णाट शासक हरिसिंह देवक शासन काल मंत्री पदकेँ सुशोभित केने छलाह। हिनक पिती धीरेश्वर, शुभदत्त आर लक्ष्मीदत्त तथा गणेश्वर सेहो पैघ–पैघ राज्याधिकारी छलाह। ओ लोकनि अपना युगक धुरन्धर विद्वान सेहो छलाह। चण्डेश्वर मिथिलाक प्रसिद्ध निबन्धकार भेल छथि आर कृत्यरत्नाकर, दानरत्नाकर, व्यवहार रत्नाकर, शुद्धि रत्नाकर, पूजा रत्नाकर, गृहस्थ रत्नाकर, विवाद रत्नाकर, राजनीति रत्नाकर हिनक प्रमुख रचना भेल छनहि। मिथिलाक धर्म व्यवस्था आर कानूनक प्रसंगमे हिनक विवाद रत्नाकर आर वाचस्पतिक विवाद चिंतामणि प्रामाणिक ग्रंथ मानल जैत अछि। स्मृति विषयपर लिखल हुनक ग्रंथ कृत्य चिंतामणिमे उत्सव–संस्कारक वर्णन अछि। चण्डेश्वरक व्यक्तित्व एवँ कृतित्वक प्रभाव उत्तरवर्त्ती विद्वानपर सेहो देखबामे अवइयै। मैथिल आर बंगाली विद्वान हुनकासँ प्रभावित देखल जाइत छथि। मिसरूमिश्र, वर्द्धमान, वाचस्पति मिश्र, आर रघुनंदन चण्डेश्वरसँ एतेक प्रभावित छथि जे ओ लोकनि अपना ग्रथमे हुनक ग्रंथक असंख्य उदाहरण देने छथि।
ओइनवार वंशक राजा भवेशक आज्ञासँ चण्डेश्वर राजनीतिरत्नाकरक रचना केलन्हि। ओहियुगक दृष्टिये एहि ग्रंथक बड्ड महत्व अछि। राजनीति विषयपर ई एकटा प्रौढ़ ग्रंथ मानल गेल अछि। एहिमे १६टा तरंग अछि आर सबहक व्यवस्था एवं क्रमबद्धतापर चण्डेश्वर विशेष ध्यान देने छथि। विषय प्रतिपादनक द्रष्टिये सेहो ई महत्वपूर्ण मानल जा सकइयै। सोलहो तंरग एवँ प्रकारे अछि–
i) राजाक निरूपण, x) सेनापतिक निरूपण
ii) मंत्रीक निरूपण, xi) दूतक निरूपण
iii) पुरोहितक निरूपण, xii) राजाक सामान्य कार्यक निरूपण
iv) प्राडविवाकक निरूपण, xiii) दण्डक निरूपण
v) सभ्यक निरूपण, xiv) राज्यव्यवस्थाक निरूपण
vi) दुर्गक निरूपण, xv) पुरोहित आदि द्वारा राज्यदान निरूपण
vii) मंत्रणाक निरूपण, xvi) राज्याभिषेक निरूपण
viii) कोषक निरूपण,
ix) सेनाक निरूपण,
अहिठाम द्रष्टव्य जे चण्डेश्वर पहिने विजिगीषु राजा अमात्य एवँ अन्यान्य प्रवृत्ति आर राज्यव्यवस्थाक प्रतिपादन केला उत्तर राज्याभिषेकपर सबसँ अंतमे विचार करैत छथि। राजाक वास्तविक एवँ न्यायसंगत उत्तराधिकारी भेला ज्येष्ठ पुत्र आर तैं राज्याभिषेक हुनके हेतैन्ह आर ताहि प्रसंगक एहिमे विस्तृत विवरण अछि। प्रत्येक विषयक निरूपण करबाक पूर्व चण्डेश्वर प्रारंभमे कोनो प्रामाणिक विधिग्रंथ अथवा राजनीतिज्ञक मतक उदाहरण दैत छथि आर तखन अपन मत स्थापित करैत छथि। पारस्परिक मतांतर एवँ विषमतामे समन्वय स्थापित करब हुनक लक्ष्य बुझना जाइत अछि। एहि ग्रंथक प्रणयनक क्रममे ओ वेद, पुराण, धर्मग्रंथ, स्मृति ग्रंथ, सूत्र ग्रंथ, राजनीति विषयक ग्रंथ आदि अध्ययन कए ओकर समन्वय स्थापित करबाक दृष्टिये सर्वमान्य सिद्धांतक स्थापना सेहो। प्रत्येक विषयक सांगोपांग विवेचन करबामे ओ बीच–बीचमे अपन स्वतंत्र टिप्पणी सेहो देने छथि जाहिसँ ई स्पष्ट अछि जे ओ कोनो बातकेँ आँखि मुनिकेँ नहि मानए बाला छलाह। एहि आलोचनात्मक टिप्पणीसँ ग्रंथक उपयोगिता आर विलक्षणता बढ़ि गेल अछि। कोनो दृष्टिये देखला उत्तर ई निर्विवाद अछि जे ‘राजनीति रत्नाकर’ अपना ढ़ँगक एक अपूर्व ग्रंथ अछि आर राजनीति चिंतनक क्षेत्रमे मिथिलाक इ अनुपम देन अछि। प्राचीन पारिभाषिक शब्दक अर्थबोधक हेतु चण्डेश्वर जे पद्धति अपनौने छथि से विशेष रूपे उल्लेखनीय अछि। विभिन्न प्रमाणसँ अपन तर्ककेँ पुष्ट कऽ कए ओ अपन मतक स्थापना केने छथि आर ओहिमे समन्वय स्थापित करबाक प्रयास सेहो। अपन ग्रंथक अंतमे ओ लिखैत छथि–“मनु एवँ अन्य स्मृति ग्रंथमे निरूपित राजनीतिक अगाध एवम विशाल सागरसँ सार स्वरूप रत्नक चयन कए हम एहि ग्रंथक रचना कैल अछि जे भगवानकेँ मान्य हेतैन्ह, राजा द्वारा समादृत होएत आर उदार व्यक्तिक ऐश्वर्य वृद्धिक हेतु लाभदायक सिद्ध हेतैन्ह”।
मध्य युगमे जखन कि राजनीति विषयक पुस्तकक कोनो अभाव नहि छल तखन चण्डेश्वरकेँ ई पोथी लिखबाक आवश्यकता कियैक भेलैन्ह। से एकटा विचारणीय विषय। ई ग्रंथ लिखबाक पाछाँ चण्डेश्वरक अभिप्राय ई छल जे प्रत्येक राजा धर्म आर अर्थमे सामंजस्य स्थापित करैत न्यायोचित मार्गपर चलिकेँ राजनीतिक वास्तविक कर्तव्य एवँ दायित्वक निर्वाह करैथ। सोलहो तरंगक प्रतिपाध विषय देखला उत्तर ई स्पष्ट भऽ जाइछ।
i) राजा:- चण्डेश्वर मनुक मतक उद्धरण दैत लिखने छथि जे संसारक रक्षार्थ। प्रजापति राजाक सृष्टि केने छलाह। प्रजाक रक्षा कैनिहार राज्याभिषेक पुरूषकेँ राजा मनल गेल अछि। याज्ञवल्म्य द्वारा वर्णित राजाकेँ अपेक्षित गुणक वर्णन सेहो कैल गेल अछि। एहि गुणक अतिरिक्त चण्डेश्वरक अनुसार राजाकेँ धार्मिक सेहो हेबाक चाही। तीन प्रकारक राजाक वर्णन ओ करैत छथि–सम्राट (चक्रवर्त्ती), सकर (कर दै वाला) आर अकर (कर नहि दै वाला) तीनुक धर्म आर गुण एक समान होएबाक चाही। प्रजाक पालन, विद्वान, बृद्ध एवँ ब्राह्मणक रक्षा राजाक मुख्य कर्तव्य मानल गेल अछि। राजाकेँ विभिन्न विषयक ज्ञान रहबाक चाही। व्यसन रहित राजाकेँ एहिक आर पार लौकिक सफलता भेटैत छैक आर अन्याय केनिहार राजाक शीघ्रहि नाश भऽ जेबाक संभावना रहैत छैक। चण्डेश्वर कौटिल्य द्वारा निर्धारित राजाक कर्तब्य आर अधिकक चर्च नहि केने छथि।
ii) अमात्य:- राजाकेँ चाही जे ओ सात–आठ सुपरिक्षित व्यक्तिकेँ अमात्य नियुक्त करैथ कारण ओहि बिनु राज काज चलब असंभव। सन्धि विग्रह आदि प्रश्नपर राजाकेँ अमात्यक संग विचार विमर्श करबाक चाही। अमात्यक परिषदकेँ मंत्रिपरिषद कहल गेल अछि।
iii) पुरोहित:- वेद–वेदार्थक ज्ञाताके पुरोहितक पदपर नियुक्त करबाक चाही। श्रौत–स्मृति कार्यमे राजाकेँ पुरोहितक संग महात्विजक नियुक्ति करबाक चाही।
iv) प्राडविवाक:- धर्म एवम न्याय व्यवस्थाक हेतु प्राडविवाक (मुख्य न्यायाधीश)क नियुक्ति आवश्यक मानल गेल अछि। प्राडविवाकक कुलीन, शील सम्पन्न, गुणवान, सत्यवक्ता, निर्भीक, चतुर आर निपुण होएबाक चाही। प्राडविवाक तीन सभ्यक संग मिलिकेँ निर्णय दैथ से सर्वोत्तम–एकमतसँ निर्णय हो तँ ओकरे धार्मिक निर्णय मानबाक चाही।
v) सभा–सभ्य:- चारि प्रकारक सभाक वर्णन भेल अछि–
i) प्रतिष्ठिता–नगर अथवा राजा द्वारा निश्चित कैल गेल स्थानपर जे सभा आहूत हो तकरा प्रतिष्ठिता कहल गेल अछि।
ii) अप्रतिष्ठिता–कोनो गाममे आयोजित होइवाला सभाकेँ अप्रतिष्ठिता कहल गेल अछि।
iii) सुमुद्रिता–जाहिमे अध्यक्ष एवँ न्यायाधीश विराजमान होथि।
iv) शासिता–जाहिमे राजा विद्धमान होथि।
सभाक दश अंग कहल गेल अछि–राजा, अधिकारी, वक्ता, सभासद, धर्मशास्त्र, गणक, लेखक, सुवर्ण, अग्नि, जल आर दण्डधारी। राजा शासन करैत छथि, अधिकारी, वक्ता भेला, सभासद निरीक्षणक कार्य करैत छथि, धर्मशास्त्र निर्णयक काज करैत छथि अछि, गणक हिसाब लिखैत छथि, लेखक न्यायालयक कार्यवाही लिखैत छथि, सुवर्ण, अग्नि आर जल सपथक सामग्री भेल। उत्तम कार्यक अधिष्ठाता, सत्य–धर्मक प्रति अमुरक्त निर्लोभ एवँ निष्पक्ष व्यक्तिकेँ राजाकेँ सभ्य चुनबाक चाही। एहने लोग धर्म आर कर्ममे निष्णात होइत छथि। निर्णयक शुद्धता सभासदक शुद्धतापर निर्भय करैत अछि। अधार्मिक बातक्ल प्रतिवाद करब हुनक प्रमुख कर्त्तव्य छल।
vi) दुर्ग:- राजाक हेतु दुर्गक निर्माण करब आवश्यक छल। छह प्रकारक दुर्गक चर्च कैल गेल अछि। राजाकेँ स्वयं गिरि दुर्गक चर्च कैल गेल अछि। राजाकेँ स्वयं गिरि दुर्गमे आश्रय लेना चाही कारण सब दुर्ग ओकरे श्रेष्ठ मानल गेल छैक। प्रत्येक दुर्गमे सब किछु रहबाक चाही।
vii) मंत्रणा:- एकांत राजभवन अथवा जंगलमे जतए मंत्रभेदक कोनो आशंका नहि हो ततए गुप्त मंत्रणा करबाक चाही। मंत्रणाकेँ सब तरहे गुप्त राखब आवश्यक।
viii) कोष:- एहने कोषकेँ प्रशंसनीय मानल गेल अछि जाहिमे द्रव्य जमाहो मुदा बाहर नहि कैल जाए। राजाकेँ कोषक वृद्धिक हेतु सतत प्रयत्नशील रहबाक चाही।
ix) सेना:- राजाकेँ सेना आर बलक व्यवस्थापर पूर्ण ध्यान देबाक चाही। एहिमे छह प्रकारक सेनाक संयोजनक चर्च भेल अछि।
x) सेनापति:- हस्ति, अश्व, रथ, पदाति सेना, सेनापतिक अधीन रहैत अछि आर एहि पदक सेहो ओतवे महत्व अछि जतवा पुरोहित आर अमात्यक। पुरूषार्थयुक्त, लोकप्रिय, दक्ष, शस्त्रास्त्रसँ युक्त, रण विद्यामे कुशल, प्रवासक संकटकेँ सहएवाला व्यक्तिकेँ सेनापतिक पदपर नियुक्त करबाक चाही।
xi) राजदूत आर गुप्तचर:- सन्धि एवँ विग्रहक दायित्व राजदूतपर निर्भर करैत अछि। एहिपर एहि ग्रंथमे विशेष विचार कैल गेल अछि। दूतकेँ सच्चरित्र, चतुर, मेधावी, देशकालक ज्ञाता, निर्भीक, आर सुवक्ता होएबाक चाही। दूतकेँ राजाक मुँह कहल गेल अछि। दूतकेँ मारबाक नहि चाही चाहे ओ मलेच्छे कियैक ने हो? गुप्तचर सेहो राज्यक प्रमुख अंग मानल गेल अछि। स्वराष्ट्र आर परराष्ट्रक वस्तुस्थितिक पता लगाएब गुप्तचरक मुख्य कार्य छल।
xii) राजाक सामान्य कार्य:- एहि प्रसंगमे मनुक सहारा लैत चण्डेश्वर लिखैत छथि–
- i) युद्धसँ विमुख नहि हैव।
- ii) प्रजाक पालन।
- iii) ब्राह्मणक सेवा।
- iv) सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव, संश्रय (षड्गुण)क चिंतन–मनन करब
- v) साम–दाम–दण्ड–भेदपर विचार करब–दण्डक प्रयोग तखने करब चाही जखन सब उपाय निरर्थक सिद्ध हो–
- vi) राजाकेँ धनक टोहमे बरोबरि रहबाक चाही।
- vii) राज्यक रक्षा आर अपन सुरक्षा–
xiii) दण्ड:- शारीरिक–आर्थिक–देशकालकेँ ध्यानमे राखि दण्ड–विधान बनेबाक चाही।
xiv) राज्यक उत्तराधिकार:- सुयोग्य ज्येष्ठ पुत्रकेँ देवाक चाही।
xv) पुरोहितक हाथे राज्याभिषेक:- उत्तराधिकार सौंपबाक पूर्वहि जँ देहावसान भऽ जाए तँ पुरोहित आर मंत्री द्वारा ज्येष्ठ पुत्रकेँ अभिषिक्त करबाक चाही। जँ कोनो पुत्र नहि ओ तँ राजवंशक कोनो उपयुक्त व्यक्तिकेँ चुनबाक चाही।
xvi) राज्याभिषेक:- राजा अपन जीवन कालहिमे ज्येष्ठ पुत्रकेँ युवराज पदपर नियुक्त कऽ सकैत छथि। जँ कोनो पुत्र नहि हो तँ प्रजा आर ब्राह्मणक परामर्शसम कोनो समीपवर्त्ती अन्यव्यक्तिकेँ ओहि पदपर आनिकेँ राज्याभिषेक कैल जा सकइयै। अभिषिक्त युवराजकेँ मान्य परम्पराक अनुसार चलबाक चाही। धर्मशास्त्र आर अर्थशास्त्रमे विरोध भेलापर मध्यम मार्गक अवलवन कए अपन व्यावहारिक बुद्धिसँ राज्यक संचालन करबाक चाही।
चण्डेश्वर अपन राजनीति रत्नाकरमे अमर सिंह, कात्यायन, कामन्दक, कुल्लूक भट्ट, कौटिल्य, नारद, भागवत, मनु, याज्ञवल्म्य, रामायण–महाभारत, लक्ष्मीधर, वसिष्ठ, विष्णु, बृहस्पति, व्यास, शुक्र, श्रीकर, हारीत, आदिसँ मत उद्धृत केने छथि। राजनीति रत्नाकर एक प्रकार संग्रह ग्रंथथिक आर मध्य युगमे जखन लोग सब मौलिक ग्रंथक अवगाहन करबामे असमर्थ छल तखन चण्डेश्वर एहि ग्रंथक रचना कए ओहि अभावक पूर्त्ति केलन्हि। एकर लोकप्रियता एवँ प्रसिद्धिक इएह कारण अछि। चण्डेश्वरक राजनीति रत्नाकर मिथिलाक हेतु एकटा आदर्श ग्रंथ भेल आर तदनुसार मिथिलामे शासन पद्धति संगठित भेल जकर प्रमाण हमरा ओइनवार वंशक शासन पद्धतिसँ लगइयै। देवसिंह अपना जीवतहि शिवसिंहकेँ युवराज बनौने छलाह। अहिठाम इहो स्मरण रखबाक अछिजे १३२५क बाद मिथिलमे मुसलमानी अमल प्रारंभ भऽ चुकल छल आर अहिठाम मुसलमान शासकक प्रतिनिधि सेहो रहैत छलाह। अहिबातकेँ ध्यानमे राखियेकेँ चण्डेश्वर अपन राजनीति रत्नाकरमे विचारक प्रतिपादित केने छथि आ अपन समन्वयताक प्रवृत्तिक परिचय सेहो देने छथि। सामंतवादी कुलीन लोकनिक प्रभाव तँ सहजहि बढ़िये गेल छल। विद्यापतिक रचना आर अन्यान्य साधन सबसँ निम्नलिखित मंत्री आर कुलीनक नाम भेटैत अछि।
i) अच्युत,
ii) महेश,
iii) रतिधर
iv) रतिपति आर शंकर
v) वाचस्पति (परिषद छलाह)
vi) रउत रजदेव
vii) अमृतकर आर अमिञंकर,
viii) गणेश्वर,
ix) चण्डेश्वर
न्याय व्यवस्थाक क्षेत्रमे मिथिलाक योग दान विशेष रहल अछि आर ताहुमे फौजदारीक क्षेत्रमे सेहो। वर्धमानक दण्डविवेक कानूनक एक प्रमुख पोथी मानल गेल अछि। न्याय व्यवस्थामे जाति सेहो देखल जाइत छल आर तदनुसार अभियुक्तकेँ सजा देल जाइत छल। सब किछु होइतहुँ वर्द्धमान बहुत अर्थमे स्पष्ट बला छलाह आर मूल सत्यकेँ पकड़ने छलाह। हुनक विश्वास छलन्हि जे लोग आ अज्ञानतावशे दिवानी मुकदमाक संख्या बढ़ैत अछि। हुनक विचार छलन्हि जे अभियुक्तकेँ एहि हिसाबे सजा देल जाइन्ह जे पुनः ओ ओहन काज नहि करए आर ओकरा चरित्रमे सुधार भऽ जाइक। ब्राह्मण अभियुक्तकेँ सुविधा भेटैत छलन्हि। गैर कानूनी ढ़ंगसँ दोसराक चीज वस्तु लेबकेँ चोरी कहल गेल अछि आर एहि प्रकारक तीनटा वर्गीकरण वर्द्धमान कएने छथि–
i) साहस कृत (डकैती)
ii) प्रकाशतस्कर (ठग)
iii) अप्रकाशास्कर (चोर)
वर्द्धमान दण्डक वर्गीकरण एवँ प्रकारे केने छथि–
दण्ड
वाक् धिक् धन् वध् निर्वासन्
धन्
धनदण्ड सर्वस्वहरण
वध
पीड़न अंगच्छेद प्रमापण
पीड़न
ताण्डव अवरोधन बन्धन विडम्बन
वाचस्पति मिश्रक अनुसार सजा देबाक अधिकार राजाकेँ छन्हि। न्यायपालिकाक अध्यक्ष राजा होइत छलाह आर हुनका कानूनक पालन करए पड़ैत छलन्हि। कानूनमे साक्ष्यक रूप ‘बृषल’केँ विश्वास नहि कैल जाइत छल आर तैं साक्षी ओ नहि भऽ सकैत छलाह। कानून आर राजनीतिक दृष्टिये वाचस्पतिक विवादचिंतामणि, नीतिचिंतामणि आर विवाद निर्णय महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। विद्यापति सेहो एकटा कानून ग्रंथ लिखने छलाह जकर नाम छल विभागसार। वकीलकेँ मिथिलामे व्यावहारिक कहल जाइत छल।
मुसलमान लोकनि शांतिसुरक्षाक हेतु ठाम–ठाम कोतवालक नियुक्ति करैत छलाह आर कोतवाल शब्दक व्यवहार हमरा विद्यापतिमे सेहो भेटैत अछि जाहिसँ ई स्पष्ट होइछ जे कोतवाल मिथिलाक शासन प्रणालीक एकटा प्रमुख अंग बनि चुकल छल। विद्यापतिमे कोतवालक हेतु कोहवार शब्दक व्यवहार अछि। बादमे कोतवालक स्थान फौजदार लेलक। काजी, ख्वाजा, मखदुम आदि शब्दक व्यवहार मिथिलाक शासन प्रणालीमे शुरू भऽ चुकल छल। वज्रघंटक विवरण सेहो भेटैत अछि। कीर्त्तिपताकासँ निम्नलिखित व्यक्ति (पदाधिकारी लोकनि?)क नाम उपलब्ध होइयै।
सूरज, राजनन्दन, हरदत्त, भिखु, पुण्डमल्ल, गोपाल मल्लिक, जयसिंह, हरिहर, रजदेव, केदारदास, सोहन, मुरारि, रामसिंह, पृथ्वीसिंह, विदु, दामोदरा, जनरंजन, सोने, विद्याधर, कमलाकर, श्रीराम, श्रीशाखो, सनेही झा। ई सब गोटए राज्यक पदाधिकारी छलाह। गोपाल मल्लिक आर पुण्डमल्ल धनुर्विद्यामे निपुण छलाह। रउत रजदेव योद्धा छलाह। युद्धक वर्णनक क्रममे ज्योतिरीश्वर ठाकुर ३६प्रकारक वस्त्रास्त्रक नाम गिनौने छथि आर विद्यापति सेहो सेनापति, दलपति आर राउतक वर्णन केने छथि। ज्योतिरीश्वर ‘राजनीति’ शब्दक व्यवहार केने छथि आर राजनीतिक केनिहारक हेतु ‘तत्वज्ञ’ शब्दक। राजनीतिकताक तत्वज्ञ्क क्रममे “मंत्रगोपन, मत्यमरण, देशरक्षा, वलावलज्ञान, कोषसंचय, व्युहरचना, व्युहप्रवेश, व्युहभंग, शंशय”क विवरण वर्णन रत्नाकरमे अछि। विद्यापतिक लिखनावलीमे निम्नलिखित शब्दावली भेटैत अछि–
- i) महापत्निक ठक्कुर
- ii) महामत्तक ठक्कुर
- iii) महासूपकार पति
- iv) महापार्णागारिक ठक्कुर
- v) स्वस्त्रागरिक
- vi) पानियगरिक
- vii) महादश नैबन्धिक ठक्कुर
- viii) महादेव गारिक ठक्कुर
- ix) कोषागार
- x) महाभानुगारिक
- xi) दलपति
- xii) राउत
- xiii) कार्यि
- xiv) ओसथि
- xv) मोकद्दम–इत्यादि।
खण्डवला कुलक समयसँ मुगल अधिकारी तिरहूतमे रहए लागल। सम्प्रति मिथिला तीन प्रमण्डलमे विभक्त अछि–तिरहूत, दरभंगा आर सहरसा।
अध्याय – 16
मिथिलाक सामाजिक इतिहास
मिथिलाक अस्तित्व वैदिक कालहिसँ अद्यावधि सुरक्षित अछि। मिथिलामे आर्यक आगमनक पूर्व मिथिलाक सामाजिक व्यवस्थाक रूपरेखा केहेन छल से कहब असंभव। ओकर ठीक–ठीक अनुमान लगायबो संभव नहि अछि। मिथिलाक संस्कृतिक अविछिन्न प्रभाव रहल अछि। आजुक मिथिलामे हमरा लोकनि जे देखैत छी ताहिसँ बहुत भिन्न ओहि दिनक अवस्था सामान्य जनक हेतु नहि छल। प्रत्येक देशक अपन अपन देशगत विशेषता होइत छैक आर ओहिपर ओहि देशक भूगोलक प्रभाव रहिते छैक। मिथिला एहि नियमक अपवाद नहि रहल अछि आर रहबे कियैक करैत? सामाजिक नियम एवँ अबधक निर्माण कोनो एक दिनमे नहि होइत छैक आर सामाजिक व्यवस्थापर मात्र भूगोलक नहि अपितु आर्थिक व्यवस्थाक प्रभाव सेहो पड़ैत छैक। पूर्व वैदिक कालमे समाजक व्यवस्था कठोर नहि बनल छल आर बहुत दूर धरि ओ व्यवस्था स्वच्छन्द एवँ मुक्त छल। समाजमे प्रत्येक व्यक्तिकेँ मुक्त वातावरणक अनुभव होइत छलैक आर ओ लोकनि कोनो स्थायी नियमक निर्माण कए नहि बैसि गेल छलाह। गतिशील समाज छल आर तैं विकासोन्मुख सेहो। एवँ प्रकारे ई समाज बहुतो दिनधरि चलल आर शनैः शनैः आर्यक विस्तार जहिना भारतवर्षक विभिन्न भागमे होमए लगलैक तहिना समाजोमे तदनुकुल परिवर्त्तन अवश्यम्भावी बुझना गेलैक आर समाजक महारथी लोकनि ओहि दिसि अपन ध्यान देलन्हि। साम्राज्यक विस्तारक संगहि अर्थनीतिक पेंच कसेऽ जाए लागल आर समाज ओहिसँ भिन्न नहि रहि सकल। वर्णाश्रमक व्यवस्था, भनेऽ कोनो इँच्च आदर्शसँ भेलहो, पछाति ओ अपन दुर्गुणक संग हमरा लोकनिक समक्ष उपस्थित भेल आर जेना जेना वर्ग विभेद बढल गेल तेना-तेना एकर स्वरूप दिन प्रतिदिन विकृत होइत गेलैक। जँ से नहि होइत तँ मिथिलामे पुनः जनक सन शासक, याज्ञवल्म्य सन विधिनिर्माता एवं गौतम सन सूक्ष्म विचारक कियैक नहि अवतीर्ण भेलाह? आर नेऽ फेर उत्पन्न भेलीह कोनो गार्गी आर मैत्रेयी? एहि मूलतथ्यकेँ जाधरि हमरा लोकनि अवगाहन करबाक चेष्टा नहि करब ताधरि हमरा लोकनिक कल्याण नहि आर ने तत्वक उचित दिगदर्शन।
सर्वप्रथम चारि वर्णक उल्लेख ऋगवेदक पुरूष सूक्तमे भेटइत अछि। प्रारंभमे एहेन बुझि पड़ैत अछि जे जखन आर्य लोकनि विस्तार भेलैन्ह आर हुनका लोकनिकेँ अहिठामक मूलनिवासीसँ सम्पर्क भेलैन्ह तखन दुहुक संस्कृतिमे पर्याप्त भिन्नता छल आर ओ लोकनिकेँ वर्णक विभाजन उचित बुझलन्हि आर तदनुकुल वर्णक विभाजन भेल। मिथिलामे आर्यक प्रसारक समय वर्णव्यवस्थाक प्रचलन भए चुकल छल। मुदा ताहि दिनमे अझुका कट्टरता देखबामे नहि अवइयै। विवाहादिक प्रसंगमे ऋगवेद आर शतपथ ब्राह्मणमे भिन्नता देखबामे अवैछ। ब्राह्मण आर क्षत्रियकेँ अपनासँ छोट वर्गमे विवाह करबाक अधिकार प्राप्त छलन्हि। ब्राह्मण कालमे शूद्र लोकनिक अवस्था शोचनीय भए गेल छल। एतरेय ब्राह्मणमे शूद्रक दुर्दशाक वर्णन भेटैत अछि। शूद्र लोकनि सब अधिकारसँ वंचित छलाह आर समाजमे हुनक स्थान निकृष्टतम् छलन्हि। कालांतरमे किछु एहेन व्यवस्था बनल जाहिमे ब्राह्मण-क्षत्रिय लोकनि सम्मिलित रूपें निम्नवर्गक शोषणमे रत भए गेलाह। एकर मूल कारण ई छल जे जँ-जँ सामाजिक व्यवस्था गूढ़ होइत गेल तँ तें ई दुहु वर्ग उत्पादनक साधन एवं तत्संबधी ज्ञानक कुंजी अपना हाथमे दबौने गेलाह आर निम्न दुहु वर्गक लोग हिनका सबहिक अधीन होइअत गेल। जखन आर कोनो चारा नहि रहलैक आर परिस्थिति दिनानुदिन बदतर होइत गेलैक तखन शूद्रकेँ वेदोसँ वंचित कैल गेलैक। एहि सब घटना क्रमक उल्लेख तत्कालीन साहित्य एवं कथा सबमे सुरक्षित अछि। दरिद्र लोकनिक की दशा रहल होइत तकर पूर्वाभास तँ महाभारतक अध्ययनसँ भेटैत अछि जतए इन्द्रोकेँ ई कहए पड़ल छन्हि जे दुःखक अनुभव करबाक हो तँ मर्त्यलोक जाकए हुनका लोकनिक संग रहिकेँ देखि आउ। महाभारतक अनुशासन पर्वमे एहि दृष्टिकोणक बहुत रास घटना वर्णित अछि।
समाजक वर्गीकरण दिनानुदिन विषम होइत गेल। शूद्र एवं अन्यान्य छोट छीन वर्ग़क लोग सब जमीनक अभावमे मजूर अथवा बेगारीक अवस्थाकेँ प्राप्त केलक आर ओम्हर दोसर दिसि गगन चुम्बी अट्टालिका ओकरा लोकनिक दयनीय एवं उपेक्षित आर असहाय अवस्थापर अट्टहास करए लागल। सूत्र एवं स्मृति साहित्यमे एहिबातक पुष्ट प्रमाण अछि। करहुक ममिलामे वैश्य-शूद्रेकेँ तंग होमए पड़ैत छलन्हि। वैदिक युगमे जाति वा वर्गक निर्णय कर्मसँ होइत छल आर आन वर्णक लोगों अपन कर्मसँ ब्राह्मण भऽ सकैत छल। शतपथ ब्राह्मणक अनुसार राजा जनक याज्ञवल्म्यक उपदेश एवं अपन कर्तव्यसँ ब्राह्मण भेल छलाह। तैतरीय ब्राह्मणमे विद्वानेकेँ ब्राह्मण कहल गेल अछि।
स्त्री, शूद्र, श्वान आर गायकेँ "अनृत"क संज्ञा देल गेल छैक। विवाहमे खरीद-बिक्रीक प्रथा छल। बहु विवाहक प्रथा सेहो छल। धनसंम्पत्तिसँ सेहो स्त्रीगणकेँ वंचित राखल जाइत छल। पूर्व वैदिक कालक जे मुक्त वातावरण छल से आव समाप्त भऽ चुकल छल आर ओकर स्थान लऽ लेने छल संकीर्णता। सामाजिक दृष्टिकोणसँ संकीर्णताक समावेश घातक सिद्ध भेल। संकीर्णताक भावनाकेँ प्रश्रय देवाक हेतु अत्यधिक साहित्य एवं कर्मकाण्डी नियमक निर्माण भेल। ओना उपरसँ देखबामे तँ इएह बुझि पड़ैछ जे स्त्रीगणक स्थान समाज बड्ड उँच्च चलन्हि मुदा ई स्थिति वास्तविकतासँ बड्ड दूर छल। गार्गी आर मैत्रेयीक नामसँ कोनो देश अपनाकेँ गौरवांवित बुझओ परञ्च हमरा लोकनिकेँ एतए ई स्मरण राखब आवश्यकजे ओ लोकनि नियमक अपवाद मात्र छलीह। ओहिठाम याज्ञवल्म्यक दोसर पत्नी कात्यायनीकेँ देखिऔक तँ बुझबामे असौकर्य नहि होएत जे समाजमे स्त्रीक वास्तविक स्थिति की छल? सुलभा आर गार्गीक देनसँ भारतक दर्शन भरपुर अछि। जतए एक दिसि मनुक्खकेँ अधिकाधिक विवाह करबाक अधिकार प्राप्त छलन्हि ओहिठाम एक स्त्रीकेँ दोसर विवाह करबाक आर दोसराक संग मेल जोलक अधिकार नहीं छलैक। सुरूचि जातकमे एकटा कथा सुरक्षित अछि जकर सारांश भेल-"मिथिलाक राज्य बड्ड विस्तृत अछि आर एहिठामक शासककेँ १६०००(सोलह हजार) पत्नी छन्हि"। एहिसँ प्रत्यक्ष भऽ जाइछ जे सामाजिक व्यवस्थामे स्त्रीगणक की स्थिति छल? एतरेय ब्राह्मणमे कहल गेल अछि जे पुतोहु अपन श्वसूरक सोझाँ नहीं जाइत छलीहे। जँ अनचोकसँ श्वसूरक नजारि पुतोहुपर पड़ि जाइत छलन्हि तँ पुतोहु बेचारी नुका रहैत छलीहे। मिथिलामे पर्दा प्रथा आर पुतोहु-श्वसूरक सम्बन्धक ई प्राचीनतम उदाहरण भेल आर मैथिल समाजमे ताहि दिनसँ अद्यावधि कोनो विशेष परिवर्त्तन नहीं देखबामे अबैछ। विधवाक स्थितिओ प्रायः अझुके जकाँ छल। समाजमे विधवाकेँ हेय दृष्टिये देखल जाइत छल आर स्थिति बदतर छल। रखेल रखबाक प्रथा, दासी पुत्रक साथ दुर्व्यवहार, व्यभिचार एवं वेश्यावृत्तिक उल्लेख सेहो भेटैछ। राजदरबारमे असंख्य दासी पुत्री आर रखेलक व्यवस्था रहैत छल। मिथिलाक विभाण्डक मुनिक पुत्र ऋषि श्रृंग्यकेँ अंगक एकटा सुन्दरी फुसला लेने छलन्हि। किंवदंती अछि जे अंगक राजा लोमपाद अपन बेटी शांताकेँ एहि कार्यक हेतु अगुऔने छलाह। एहि घटनाक उल्लेख अश्वघोष सेहो कएने छथि।
-"ऋष्य श्रृंग मुनि सुतं स्त्रीष्व पंडितम्।
उपायै विविधैः शांता जग्राहच जहारच"॥
पुराण आर जातकमे वर्णित समाजमे बहुत किछु समानता अछि। दिन प्रति दिन समाजमे कट्टरता एव अनुदार भावना जड़ि पकड़ने जाइत छल। धनक महत्व बढ़ए लागल छल आर विद्या आर विद्वानक महत्व क्रमशः घटए लागल छल। ओना तँ लक्ष्मी-सरस्वतीक आपसी द्वेष बौद्धयुगमे आविकेँ विशेष रूपें चरितार्थ भेल छल मुदा ओहुँसँ पूर्वहुँ हमरा एहि सब वस्तुक स्पष्ट उदाहरण भेटइत अछि। ब्राह्मणक अपेक्षा धनाढ्यक प्रतिष्ठा बढ़ि रहल छल। आवश्यकतानुसार आब लोक अपन रोजगार चुनए लागल आर प्राचीन कालमे ब्राह्मण लोकनिक लेल जे खेती निषिद्ध मानल जाइत छल से आब नहि रहि गेल। ब्राह्मण खेती आर व्यवसाय दुहुमे लागि गेलाह। पुराणादिक अध्ययनसँ ई सब बात स्पष्ट भऽ जाइछ। बौद्धसाहित्यक अनुसार ब्राह्मण लोकनि अपन जीविकाक हेतु सब काज करैत छलाह। जातक तँ एहि प्रकारक कथा सबसँ भरले अछि। सामाजिक नैतिकतामे सेहो परिवर्त्तन भेल आर प्राचीन मूल्याँकनक मापदण्डमे सेहो समयानुसार उचित संशोधन आर परिवर्त्तन कैल गेल।
मनुक्खक जीवनक कमसँ कम तीनटा विभाजन सर्वप्रथम छान्दोग्य उपनिषदमे देखबामे अवइयै। उपनिषद कालमे मिथिलामे क्षत्रिय ब्राह्मणक स्तर धरि पहुँचि चुकल छलाह। ज्ञान एवं ब्रह्मविद्याक क्षेत्रमे ओ कोनो रूपें ब्राह्मणसँ कम नहि छलाह। उपनिषदमे कर्मकाण्डक विरोधमे उठैत भावनाक प्रदर्शन सेहो देखबामे अवइयै। उपनिषदमे हम जे देखैत छी ताहिसँ स्पष्ट अछि जे ओ युग मिथिलाक सामाजिक-साँस्कृतिक इतिहासक उत्कर्षक युग छल आर सब तरहे सुखी सम्पन्न सेहो। एक बात जे स्मरणीय अछि उ भेल ई जे मिथिलाक क्षत्रिय शासक कोनो रूपेँ ब्राह्मणसँ अपनाकेँ कम नहीं बुझैत छलाह आर ब्राह्मणोकेँ ई स्वीकार करबामे कोनो आपत्ति नहि छलन्हि। स्वयं याज्ञवल्म्य जनकक एहि गुणकेँ स्पष्ट रूपे मनने छथि आर गीतामे सेहो एकर संकेत अछि। वर्ण व्यबस्था ताहि दिनमे एतेक दृढ़ नहि भेल छल।
बौद्ध एवं जैन धर्म कार्य क्षेत्र सेहो मिथिलामे छल आर एकर प्रभाव तत्कालीन समाजपर पड़ब स्वाभाविके छल। अवैदिक धर्मक विकासक मुख्य स्थान छल मगध आर वैशाली सेहो ओहि प्रभावसँ अक्षुण्ण नहि छल। बौद्ध युग धरि अबैत अबैत ब्राह्मण सत्ताक भीत ढ़हि रहल छल आर क्षत्रिय लोकनिक प्रभाव चारूकात दिनानुदिन बढ़ि रहल छल। भोजन भावक नियमादमे सेहो परिवर्त्तन अवश्यम्भावी भऽ गेल छल। जातकक अनुसार एहि युगमे ब्राह्मण लोकनि सबहिक संग भोजन भाव करैत छलाह आर एहेन ब्राह्मण सबकेँ कट्टर वैदिक लोकनि अपना पाँतीसँ फराकेँ रखैत छलाह। सभहिक संग खेनिहार ब्राह्मण लोकनिकेँ पतित कहल जाइत छल। सामाजिक मान्यताक हेतु एहि युगमे संघर्ष चलैत रहल आर तरह तरहक उथल-पुथलक कारणे समाजमे सतत अस्थायित्व बनल रहल।
आजीविक, जैन, आर बौद्ध संप्रदायक प्रसारसँ वेदक अपौरूषेयतामे लोगक संदेह उत्पन्न होमए लगलैक आर एवं प्रकारे समाजक वर्गीकरणमे सेहो कारण उपरोक्त तीनू सम्प्रदायक नेना वर्नव्यवस्थाक कट्टर विरोधी छलाह। एकरे प्रभाव स्वरूप जाति पातिक खाधि भोथा रहल छल आर एहि अग्निधार बहुत रास सड़ल विचारक होम सेहो भए रहल छल। प्रारंभमे वैशालीसँ आगाँ एहि विचार सबहिक दालि नहीं गलल छलैक परञ्च काल क्रमेण एकर प्रभावसँ मिथिला मुक्त नहीं रही सकल-वैशालियो पूर्णतः वर्ण-व्यवस्थासँ मुक्त नहि भऽ सकल यद्दपि बौद्ध लिच्छवी लोकनिकेँ तावतिंशदेव कहने छथि। धनक प्रभाव एहि सब क्षेत्रमे सेहो बनले छल आर गरीब मानवता कहिओ अपनापर होइत अन्यायक विरोधमे सशक्त भऽ कए ठाढ़ नहीं भऽ सकल। लिच्छवी लोकनिक रहन सहन सेहो वर्गगत छलन्हि जँ एहि व्यवस्थामे कतहु कोनो प्रकारक घूंट देखबामे अवैत हो तँ ओकरा नियमक अपवाद कहब। समाजक भद्र लोकनि चाण्डालकेँ हेय दृष्टिसँ देखैत छलाह आर समाजमे चाण्डालक स्थिति बदतर छल। ओ लोकनि नगरसँ बाहर रहैत छलाह। घृणित कार्य हुनके सबसँ कराओल जैत छल। हुनका लोकनिक अवस्थामे सुधारक कोनो आसार देखबामे नहि अबैत छल।
भृत्य, गुलाम, बहिया आदिक स्थिति तँ आर चिंतनीय छल कारण ई लोक्नि तँ शूद्रक कोटिमे छलहि। स्वयं बुद्ध जे अपना मुँहसँ गुलामक अवस्थाक वर्णन कएने छथि ताहिसँ रोमाँच भऽ जाइछ। जातकमे चारि प्रकारक गुलामक वर्णन अछि। वहियाक प्रथा मिथिलामे अति प्राचीन कालसँ चलि आबि रहल अछि। कौटिल्यक अर्थशास्त्र आर अन्यान्य ग्रंथ सबमे एकर उल्लेख भेटइयै। वेश्याक प्रचलन ऐहु युगमे छल आर वैशालीक अम्बपालीक नाम तँ सर्वविदित अछिये। यद्दपि बुद्ध स्वयं एहि व्यवस्थाक विरोधी छलाह आर एतए धरि जे ओ स्त्रीकेँ संघमे एबासँ वर्जित करैत छलाह मुदा तइयो जखन अम्बपाली हुनका प्रति अपन भक्ति दरसौलक तखन बुद्ध ओकर निमंत्रण स्वीकार कए ओतए गणिकाक ढ़ेर लागल रहैत छल। एहिमे बहुतो नृत्य एवं संगीत कलामे निपुण होइत छलीहे। कोनो कोनो राजदरबार १६०००गणिका उल्लेख भेटइयै। पर्दा प्रथाक संकेत बौद्धयुगमे भेटैत अछि।
बौद्धकालमे धनसंपति आर राज्याधिकार सामाजिक मापदण्ड भेल आर क्षत्रिय लोकनिक महत्व समाजमे एतेक बढ़लन्हि जे ओ लोकनि आब विशेषरूपेँ आहूत होमए लगलाह। विदेह-वैशालीमे ओ लोकनि आर शक्तिशाली छलाह। वर्ण-व्यवस्थामे एवं प्रकारे सेहो थोड़ेक परिवर्तन हैव स्वाभाविक भऽ गेल। अशिक्षित ब्राह्मण लोकनि निम्नस्तरकेँ प्राप्त भेलाह। क्षत्रिय लोकनिक प्रभाव वृद्धिक सबसँ पैघ उदाहरण इएह भेल जे वैशालीक अभिषेक पुष्पकरिणीमे लिच्छवी राजा लोकनि अनका स्नान नहि करए दैत रहथिन्ह। समस्त लिच्छवी क्षेत्र तीन हिस्सामे वर्ग अथवा वर्णक आधारपर बटल छल आर प्रत्येक क्षेत्रक रहनिहार अपनहि क्षेत्रमे विवाहादिक सकैत छल। पैघ वर्णक बालक जँ छोट वर्णक कन्यासँ विवाह करए तँ ताहि दिनमे एकर मान्यता छल मुदा एहिबात एकबात स्मरण राखबाक ई अछि जे राजकुमार नाभाग जखन एक वैश्य कन्यासँ विवाह केलन्हि तखन हुनका गद्दीसँ वंचित कए देल गेलन्हि। एहिसँ अनुमान लगाओल जाइत अछि जे राजदरबारमे अंर्तजातीय विवाहकेँ प्रोत्साहन नहीं देल जाइत छल। कुलेन परिवार एवँ अभिजातवर्गक सदस्य गण ताहु दिनमे एकर कट्टर विरोधी छलाह।
ब्रह्मचारी एवं धर्मप्रचारक लोकनि कतहु भोजन कऽ सकैत छलाह। ओ लोकनि जातीयताक बन्धनसँ अपनाकेँ मुक्त मनैत छलाह। शूद्र लोकनि भनसिया नियुक्त होइत छलाह। माँछ-माँउसक व्यवहार ब्राह्मण लोकनिक ओतए सेहो होइत छल। भोजन-भावमे मध्ययुगीन कट्टरता ताहि दिनमे नहि छल। गैर ब्राह्मण लोकनि सेहो सब किछु खाइत-पीबैत छलाह। छुआछूतक कट्टरता नहि रहितहुँ ई देखबामे अबैछ जे चाण्डालसँ सब केओ फराकेँ रहैत छलाह आर चाण्डाल नगरक बाहर रहैत छल। चाण्डालकेँ अछूत बुझन जाइत छल आर जँ ओकर नजरि ककरो भोजनपर पड़ि जाइत छल तँ ओहि भोजनक परित्याग कैल जाइत छल। बुद्धक संघक स्थापनाक पछाति बहुतो शूद्र आर छोट वर्णक लोग सब ओहिमे सम्मिलित भेल छल।
वर्णाश्रमक प्रधानता तथापि बौद्धयुगमे बनले रहल। एहि युगमे ब्रह्म चर्याश्रमक प्रधानता विशेष छल। विभिन्न आश्रमक महत्वपर एहि युगमे बेस विवाद चलि रहल छल। विवादक मुख्य प्रश्न इएह छल जे व्राणप्रस्थ आर सन्यासमे कोन उत्तम? ओना तँ एहि युगमे हमारा ई देखैत छी जे सन्यासक प्रवृत्ति दिनानुदिन बढ़ि रहल छल। मार्कण्डे पुराणक कथाक अनुसार वैशालीक राजा लोकनि-खनित्र, मरूत्त, वरिष्यंत, मंखदेव आदि-सन्यास ग्रहण कएने छलाह। ब्रह्मचर्य, ग्रार्हस्थ, वाणप्रस्थ आर सन्यासी सम्बन्धी नियम एखनो पूर्णरूपेण स्थायी नहि भेल छल। बौधायन धर्मसूत्रमे तँ वाणप्रस्थ आर सन्यासक प्रतिकूल वातावरण देखबामे अवइयै। किछु धर्मसूत्र सबमे गृहस्थाश्रमक अपेक्षा वाणप्रस्थक सराहना कैल गेल अछि मुदा इहो विचार ततेक संदिग्ध रूपे प्रगट भेल अछि जे ओहि सब आधारपर किछु निश्चित बात कहब अथवा कोनो मत निर्धारित करव असंभव। एहियुगमे परिवारक चर्च सेहो भेटैत अछि। ताहि दिन भिन्न-भिनाओज नीक नहि बुझल जाइत छल। कन्याक हेतु विवाहक निश्चित आयु १६वर्ष छलैक आर जाहि कन्याकेँ भाई इत्यादि नहि रहैत छलैक से अपन पैत्रिक धनक उत्तराधिकारिणी सेहो होइत छल। 'स्त्रीधन' सिद्धांतक विकास एहि युगमे भेल छल। सती प्रथाक उल्लेख सेहो ठाम-ठाम भेटैत अछि। वैशालीक राजा खनित्र आर वरिष्यंतक पत्नी सती भेल छलथिन्ह। मादरी जे अपनाकेँ एहि सतीत्वमे अनने छलीह ताहुसँ सती प्रथाक संकेत भेटैत अछि।
बौद्ध युगक ओना इतिहासमे अपन विशेष महत्व छैक परञ्च वैशालीक हेतु तँ ई स्वर्णयुग छल। जाहि पुश्करिणीक उल्लेख हमारा पूर्वहि कऽ चुकल छी ताहिमे स्नान करबाक हेतु श्रावस्तीक सेनापति बन्धुल मल्लक स्त्री मल्लिका व्यग्र छलीह आर एकर वर्णन हमरा जातकमे भेटैत अछि। जातकमे कहल गेल अछि- -"वैशाली नगरे गणराज्य कुलानाम्।
अभिषेक मंगल पोक्खरी नम्॥
ओतरित्वा नहातापानीयम्।
पातुकम् अहि समीति"॥
बन्धुल अपना पत्नीकेँ लए ओहिठाम गेलाह मुदा पहरू लोकनि हुनका दुहुकेँ नहीं जाए देलथिन्ह आर अंतमे एहि लेल युद्ध भेल आर ओ दुनु गोटए ओहिमे स्नान कए घुरइत गेलाह। एकर अतिरिक्त वैशालीमे आर कतेको दर्शनीय वस्तु छल-उदेन चैत्य, गोतमक चैत्य, चापाल चैत्य, कपिनय्य चैत्य. मर्कट हृदतीर चैत्य, मुकुट बन्धन चैत्य, इत्यादि। वैशालीमे एहि युगमे महालि, महानाम, सिंह, गोश्रृंङ्गी, भद्द आदि नामक प्रधान व्यक्ति भेल छलाह। चुल्लुवग्गमे लिच्छवी भद्रक उल्लेख एहि प्रसंगमे अछि जे एकबेर हुनका बौद्धसंघसँ निष्काषित कए देल गेल छल मुदा पुनः सुधार भेलापर हुनका लऽ लेल गेल छल। ओहि समयमे समाजसँ निष्काषित करबाक प्रथा एवं प्रकारे छल=जाहि सभ्यकेँ निष्कासित करबाक होन्हि तिनका भोजनार्थ निमंत्रण देल जाइत छलन्हि आर आसनपर बैठला उत्तर हुनक जल पात्रकेँ उलटि देल जाइत छलन्हि। पुनः जखन हुनका समाजमे लेल जाइत छलन्हि तखन ओहिपात्रकेँ सोझ कऽकेँ राखल जाइत छलैक। जाहि समयमे तोमर देव वैशालीक प्रधान छलाह तखन लिच्छवी लोकनि साज गोज कए हुनक स्वागत कएने छलाह। केओनील, केओ स्वेत आर केओ लालरंगक शास्त्रास्त्र एवं आभूषण आर वेशभूषासँ सुसज्जित भए बु्द्धक स्वागतार्थ उपस्थित भेल छलाह। महा विष्णुमे एकर विवरण एवं प्रकारे अछि-
-"संत्यत्र लिच्छवयः पीतास्या प्रीतरथा
पीत रश्मि प्रत्योदयष्टि। पीतवस्त्रा,
पीतालंकारा, पीतोष्णीशा, पीतछत्राः
पीतखङ्ग मुनिपादुका।
पीतास्या पीतरथा पीतरश्मि प्रत्योदमुष्णीशा।
पीता च पंचक कुपा नीलावस्त्रा अलंकारा:॥
वैशालीक आम्रकानन जाहिमे अम्बपाली रहैत छलीहे सेहो बड्ड प्रसिद्ध छल। बौद्ध धर्मक इतिहासक दृष्टिकोणसँ सेहो वैशालीक अत्यधिक महत्व अछि। अहिठाम ई निर्णय लेल गेल छल जे स्त्री लोकनिकेँ संघमे प्रवेशक अनुमति देल जाइन्ह। एतहि भिक्षुणी संघक स्थापना सेहो भेल छल। आनंदक कहलापर बुद्ध एहिबातकेँ मनने छलाह आर एहिपर अपन स्वीकृति दैत बौद्धधर्मक सम्बन्धमे भविष्यवाणी सेहो कएने छलाह-"स्त्री जातिक प्रवेशसँ बौद्ध धर्म आव ५००वर्ष धरि जीवित रहत"। वैशालीसँ जेबा काल बुद्ध ई कहीं गेल छलाह जे आब ओ पुनः एतए घुरिकेँ नहि आवि सकताह। वैशालीक लोग सब ई सुनि बड्ड दुखी भेलछल-
-"दं अपश्चिमं नाथ वैशाल्या स्तव दर्शनम्।
न भूयो सुगतो बुद्धो वैशाली आगमिष्यति"॥
हुनका महापरिनिर्वाणक सय वर्ष बद वैशालीमे बौद्धसंघक दोसर संगीति भेल छल। मिथिलाक माँटिमे एहेन प्रभाव जे अहिठामक लोग सब वेस तार्किक होइत छलाह। नागार्जुनक शिष्य भिक्षुदेव जखन वैशाली जेबाक हेतु प्रस्तुत भेलाह तखन नागार्जुन कहलथिन्ह-"ओना अहाँ जाए चाहैत छी तँ जाउ मुदा ई स्मरण राखब जे ओहिठामक नदीनो भिक्षुक लोकनि बड्ड जबर्दस्त तार्किक होइत छथि"।
जैन ग्रंथ सबसँ सेहो ताहि दिनक सामाजिक अवस्थाक विवरण भेटइयै। वैशालीमे क्षत्रिय, ब्राह्मण आर वणिक भिन्न-भिन्न उपनगरमे रहैत छलाह। सामाजिक क्षेत्रमे हुनका लोकनिक मध्य सहयोग एवं सहकारिताक भावना व्यापक छलन्हि। दालि, भात, तरकारीक अतिरिक्त ताहि दिनमे माँछ-माँउसक प्रचलन सेहो छल। अपना नगरसँ हुनका लोकनिकेँ बड्ड प्रेम छलन्हि। हीरा, जवाहिरात, सोना, चानीसँ हुनका लोकनिक हाथी, घोड़ा, आर सवारी सजल रहैत छलन्हि। शिकार हुनका लोकनिकेँ बड्ड प्रिय छलन्हि। अंगुत्तर निकायक अनुसार लिच्छवी बालक लोकनि बड्ड चंचल आर नटखटिया होइत छलाह। लिच्छवी लोकनि स्वतंत्रता आर स्वाभिमानक प्रेमी छलाह। शिक्षा प्राप्त करबाक हेतु ओ लोकनि दूर-दूर देश धरि जाइत छलाह। विवाहक नियमावली लिच्छवी लोकनिक हेतु कठोर छलन्हि। जाहि कन्याकेँ विवाह करबाक विचार होन्हि से लिच्छवी गणकेँ सूचना दैत रहथिन्ह आर गणक दिसि हुनका लेल सुन्दर वर चुनल जाइत छल। स्त्रीक सतीत्वक रक्षार्थ लिच्छवी लोकनिक किछु उठा नहि रखैत छलाह। एहिमे राजा आर रंकमे कोनो कानूनी भेद नहीं छल। मृतकक दाह संस्कारक सम्बन्धमे सेहो हुनका लोकनिक अपन नियम छलन्हि-मुर्दा जरेबाक, गारबाक, अथवा ओहिना छोड़ि देबाक प्रथा हुनका ओतए छलन्हि। मुर्दाकेँ गाँछमे लटकेबाक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। हुनका लोकनि ओहिठाम एकटा उत्सव होइत छल जकरा "सब्बरतिवार" कहल जाइत छल जाहिमे ओ लोकनि भरि राति जागिकेँ नाच गान करैत छलाह आर एकर उदाहरण अंगुत्तर-निकायमे भेटैत अछि।
मौर्य युगमे सर्वप्रथम समस्त भारतक राजनैतिक एकीकरण भेल आर मिथिलाक क्षेत्र अखिल भारतीय साम्राज्यक अंग बनल। सामाजिक दृष्टिकोणसँ सेहो ई युग महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। राज्यक स्वरूप मंगलकारी छल यद्दपि राजाक शक्तिमे अपार बृद्धि भेल छलैक। आर प्रत्येक व्यक्ति जीवनकेँ सुखी रूपे व्यक्त करबा लेल इच्छुक छल। ताहि दिनमे मनुष्य सुगठित, स्वरूप आर बलवान होइत छल। वस्त्राभूषणक प्रति हुनका लोकनिक स्नेह बिशेष रहैत छलन्हि आर खेल कूद, नाच गाना आर संगीतक प्रचलन बढ़िया छल। मगधक राजधानी पाटलिपुत्र ताहि दिनमे संसारक सर्वश्रेष्ठ नगर छल आर प्रधान क्रीड़ा केन्द्र सेहो। एहि क्रीड़ाक अंतर्गत शाल-भंजिका एवं अशोक पुष्प प्रचायिका विशेष रूपे प्रचलित छल। कौटिल्यक अर्थशास्त्र आर अशोकक अभिलेखमे उत्सव, समाज, आर यात्राक उल्लेख भेटैत अछि जाहिमे आमोद-प्रमोदक व्यवस्था छल आर सब केओ बड्ड उत्साहसँ ओहिमे भाग लैत छलाह। कौटिल्य वर्णाश्रम धर्मक बड्ड पैघ समर्थक छलाह। एहि धर्मक समुचित पालन कराएब राजाक कर्तव्य छल। अशोकक शासन कालमे वर्णाश्रम धर्मपर विशेष ध्यान नहि देल गेल कारण अशोक स्वयं बौद्ध छलाह आर हुनका एहि व्यवस्थापर पूर्ण आस्था नहि छलन्हि। चन्द्रगुप्त मौर्य स्वयं शूद्र छलाह तैं हम देखैत छी जे एहि युगमे शूद्रक प्रति कौटिल्यक विचार मनुक अपेक्षा विशेष उदारवादी छल। वर्ण व्यवस्थाक अंतर्गत कतेको जाति–उपजाति बढ़ि गेल। मनु तँ बहुतों विदेशी जाति सबकेँ क्षत्रियक श्रेणीमे रखने छथि। मिथिलाक लिच्छवी लोकनिकेँ सेहो मनु व्रात्य कहने छथि। व्रात्यकेँ सेहो ओ चारि वर्णमे बटने छथि–व्रात्य ब्राह्मण, व्रात्य क्षत्रिय, व्रात्य वैश्य एवँ व्रात्य शूद्र। यवन दूत मेगास्थनीज लिखने छथि जे एहिठाम युनान जकाँ गुलामक व्यवस्था नहि छल। एहि युगमे स्त्रीकेँ अवस्थामे सेहो परिवर्त्तन भेलैक। कौटिल्य स्त्रीकेँ सम्पत्ति अर्जित करबाक आर रखबाक अधिकार देने छथिन्ह। अपना जेवरपर खर्च करबाक अधिकार सेहो हुनका लोकनिकेँ छलन्हि। जँ कोनो व्यक्तिकेँ बेटा नहि रहैक तँ ओकरा बेटीकेँ ओहि सम्पत्तिक स्वामित्वधिकार भेटैत छलैक। स्त्रीक कल्याणक हेतु अशोकक समयमे “स्त्री–अध्यक्ष–महामात्र”क नियुक्ति भेल छलैक। गुलाम लोकनिक प्रति सेहो राज्यक विचार उदार छल। प्रत्येक गुलामकेँ अपन स्वतंत्रता प्राप्त करबाक अधिकार छलैक।
मौर्यौत्तर कालमे चारि वर्णक व्यवस्था बनल रहल। जति आर उपजातिक संख्यामे विशेष बृद्धि भेल। चारूवर्णक लोग अपना–अपना वर्णक अभ्यंतरहिमे वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करैत छलाह। वराहमिहिरक वृहत्संहिताक अनुसार नगरमे चारूवर्णक भिन्न–भिन्न क्षेत्र होइत छल। चीनी यात्रीक विवरणसँ स्पष्ट अछि जे ब्राह्मण लोकनि पूज्य बुझल जाइत छलाह। ब्राह्मण लोकनिक शुद्ध जीवन व्यतीत करबाक प्रसंग सेहो ओहिमे भेटैत अछि। समाजमे ब्राह्मणक प्रतिष्ठा विशेष छल आर मनु ओकरा आर प्रतिष्ठित बनौलन्हि। नारदक अनुसार श्रोत्रिय लोकनिकेँ कर नहि लगबाक चाही। ब्राह्मण वर्गकेँ सब प्रकारक सुविधा प्राप्त छलन्हि। गुप्त युगमे ब्राह्मण लोकनिक वर्गीकरण वैदिक शाखाक अनुरूप भेल। पाछाँ आविकेँ एकर आर वर्गीकरण भेल।
मौर्यौत्तर कालीन भारतमे क्षत्रिय लोकनिक प्रधानता बढ़ल। शूंग वंश आर कण्ववंशक स्थापनासँ मिथिलामे पुनः ब्राह्मण धर्मक पुनर्स्थापन सम्भव भेल आर ब्राह्मण लोकनिक सत्तामे बृद्धि सेहो। एहियुगमे मिथिलाक ब्राह्मण मिथिलासँ बाहर जाए अपन शाखा–प्रशाखाक स्थापना कएने छलाह। शासन भार जे केओ लैथ हुनक धर्म क्षत्रिय युद्धविद्या, कला, संगीतमे तँ पारंगत होइते छलाह संगहि ओ लोकनि विद्वान सेहो होइत छलाह। समुद्रगुप्तक प्रयाग प्रशस्तिसँ एहिपक्षपर विशेष प्रकाश पड़इयै। जे केओ शासक अथवा राजा होइत छलाह हुनके क्षत्रियक संज्ञा भेटैत छलन्हि। गुप्तशासक लोकनि ओना तँ क्षत्रिय नहि छलाह मुदा जखन राजा भऽ गेलाह तखन ओ क्षत्रिय कहब लगलाह। राजाक गुणक विवरण बाणक हर्षचरितमे सेहो भेटैत अछि। कृषि आर व्यापारक भार वैश्यपर छलन्हि। ई लोकनि दान आर धर्मक प्रपक्षी होइत छलाह। स्थान–स्थानपर धर्मशाला, अस्पताल आर सत्रक स्थापना ई लोकनि बड्ड प्रेमसँ करबैत छलाह। व्यापार आर उद्योगक संचालनार्थ ई लोकनि अपना मध्य जे संगठन बनौने छलाह तकरा श्रेणी अथवा गिल्ड कहल जाइत छल। मिथिलामे श्रेष्ठी आर सार्थवाहक जे उल्लेख भेटैत अछि सेहो हिनके लोकनिक तत्वावधानमे बनैत छल। शूद्र लोकनिक स्थिति चिंतनीय छलन्हि। ओ लोकनि छोत छीन रोजगारक संग खेती गृहस्थी सेहो करैत जाइत छलाह। हुनका लोकनिकेँ वेद पढ़बाक अधिकारसँ वंचित राखल गेल छल। बिना मंत्रक ओ लोकनि अपन यज्ञादि करैत छलाह। मूल रूपें ओ लोकनि दू भागमे बटल छलाह–सत्–शूद्र आर असत्–शूद्र। असत्–शूद्रकेँ अछूत कहल जाइत छलन्हि। अनुलोम–प्रतिलोम प्रथाक कारणे कतेको मिश्रित जातिक अर्विभाव समाजमे भ चुकल छल। चाण्डालक स्थिति यथावत् छल। मिथिलाक उत्तरी छोरपर थारू आर किरात नामक जाति सेहो बसैत छल।
विवाहादिक नियममे कोनो विशेष परिवर्त्तन एहियुगमे नहि भेल। अपन–अपन जातिक अंतर्गतहिमे विवाहादि होइत छल। अनुलोम–प्रतिलोम विवाहक उल्लेख सेहो यदा–कदा भेटिते अछि। एहियुगमे स्त्रीगणक स्थितिमे आर अवनति भेल। हुनका लोकनि शूद्रे जकाँ वेदक अध्ययनसँ वंचित राखल गेल। वेद मंत्रोच्चारण ओ लोकनि नहि कसकैत छलीह। किछु गोटए पढ़ल–लिखल सेहो होइत छलीहे मुदा ओहन स्त्रीगणक संख्या महान समुद्रमे एकठोप तेल जकाँ छल। पर्दा प्रथाक सम्बन्धमे कालिदास घूंघट–घोघक उल्लेख केने छथि। एहि युगमे स्मृतिकार लोकनि विधवाक सम्बन्धमे आर कठिन नियम बनौलन्हि। शंख, अंगीरस आर हरीत स्मृतिमे तँ एतेक धरि कहल गेल आछि जे विधवाकेँ अपना पतिक चितापर जरिकेँ प्राणांत कए लेबाक चाही। तत्कालीन अभिलेखमे सेहो सतीक उल्लेख भेटइयै।
वस्त्राभूषणमे ताहिदिनक लोग शौकीन होइत छलाह। रेशमी सूती आर ऊनी कपड़ाक विशेष प्रचलन छल। धोती, साड़ी, साया, दुपट्टा, आंगी, जनउ, बाला इत्यादिक व्यवहार होइत छल। मिथिलाक क्षेत्रसँ प्राप्त मूर्त्तिसँ तत्कालीन वेशभूषाक ज्ञान होइछ। लोग सब नामीक नीचासँ धोती पहिरैत छलाह आर स्त्रीगण सब साड़ी सेहो ओहिना। स्त्रीगण अब साड़ीक संगे दूपट्टो ओढ़ैत छलीह। टोपीक व्यवहार सेहो होइत छल। नौलागढ़सँ जे एक गोटए बेस सुन्दर मुरेठा बन्हने अछि। ई मुरूत गुप्तकालीन थिक। ओहुसँ पहिलुका आर एकटा सुन्दर स्त्रीक माटिक मुरूत ओताहसँ भेटल आछि जाहिमे केश विन्यास शैली आर विशेषता देखबामे अवइयै। सौन्दर्य प्रसाधन एवँ श्रृंगार प्रक्रियाक रूप एहि दुहु माँटिक मुरूत बढ़िया जकाँ ज्ञात होइत अछि आर संगहि दु युगक सौन्दर्य साधनक ज्ञान सेहो। स्त्रीक मुरूत शुंगकालीन थिक। मिथिला आर वैशालीसँ प्राप्त माँटिक मुरूतसँ तत्कालीन सौन्दर्य प्रसाधनक चित्र भेटइयै। औंठी, कर्णफूल, कण्ठहार, बाला, इत्यादिक व्यवहार होइत छल। ताहि दिनमे जे मिथिलाक स्त्रीगण पाइत पहिरैत रहैथ तकरो अन्यतम नमूना मिथिलाक मुरूत सबमे भेटैत अछि। सुगन्धित तेल आर अन्यान्य सौन्दर्य साधनक व्यवहार सेहो ताहि दिनमे होइत छल। दाँतमे मिस्सी लगेबाक प्रथा सेहो छल आर हियुएन संग एकर उल्लेख कएने छथि।
गुप्तयुगक पछाति एवँ कर्णाटवंशक उत्थान धरि वर्णाश्रम धर्मक प्रधानता बनले रहल आर ठाम–ठाम कठोर सेहो भेल। स्मृतिकार लोकनिक रचनासँ एकर मान होइछ। अनुलोम–प्रतिलोमक फले अनेको वर्णशंकर उपजाति आदिक विकास भेल। असत् शूद्र अंतयजक नामसँ पाँचम वर्गमे परिगणित भेल। एहियुगमे पंचगौड़क कल्पना सेहो साकार भेल आर पंचगौड़ ब्राह्मण लोकनि दोसरो वर्णक जीविकाकेँ अपनौलन्हि। यज्ञल संगहि संग ओ लोकनि मूर्त्तिपूजा आर पुरोहिताइक पेशा सेहो अपनौलन्हि। ब्राह्मण लोकनि सेनापतिक काजमे सेहो निपुण होमए लगलाह। पालवंशक अधीन बहुतो ब्राह्मण सेनापति रहैथ जकर उल्लेख पाल अभिलेखमे अछि। एहियुगमे ब्राह्मण लोकनिकेँ प्रचुर मात्रामे खेत दानमे भेटल छलन्हि आर ओ लोकनि पैघ–पैघ सामंत भएल छलाह आर जमीनकेँ दोसरा हाथे खेती करबाय ओ लोकनि अपन सामंत प्रदत्त राजनैतिक अधिकारक सुरक्षामे व्यस्त रहैत छलाह। ब्राह्मण–क्षत्रिय आब खेतियो दिसि भीर गेल छलाह। शूद्र लोकनिक अवस्था आर दयनीय भगेल छलैक। एहियुगसँ डोम, चमार, नट आदिक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। भाटक उल्लेख तँ सहजहि भेटितहि अछि। एहियुगमे जातिकर्म, नामकरण, उपनयन, विवाह, श्राद्ध इत्यादि संस्कारक उल्लेख भेटैत अछि। विवाह संस्कार प्रधान सामाजिक संस्कार मानल जाइत छल। बहु पत्नित्वक उदाहरण सेहो भेटैत अछि। ब्राह्मण अन्य जातिज भोजन अथवा जल नहि ग्रहण करैत छलाह। एहियुगमे प्रायाश्चितक विधान सेहो बनल। माँछ, माउँस आर मदिराक व्यवहार होइत छल। सिद्ध कवि लोकनिक लेखतँ एहि सब विवरणस भरल अछि। चर्यावद(मैथिलीक आदि रूप)मे एकठाम लिखल अछि जे स्त्री लोकनि मदिरा बेचइत छलीह। क्षत्रिय लोकनि विशेष मदिरा पान करैत छलाह। पहिरब–औढ़बमे कोनो विशेष फर्क देखबामे नहि अवइयै। मूर्त्ति सबसँ श्रृंङ्गभरिकताक मान होइछ। कर्णफूल, हार, भुजदण्ड, करघनी, कंगन, बाला आदि आभूषणक व्यवहार होइत छल। कुमकुम लगेबाक प्रथा सेहो छल। सतीप्रथाक प्रचलन तँ चलिये आबि रहल छल। एकलेखमे दीपावलीक उल्लेख सेहो भेटैत अछि–
“दीपोत्सव दिने अभिनव निष्पंत प्रेक्षा मध्य मण्डपे”।
संगीत आर नृत्यक आयोजन तँ बरोबरि होइते छल। चर्यापदमे सतरंजक उल्लेख सेहो अछि। जूआक प्रथा प्रचलित छल। एहियुगमे अन्धविश्वास आर तंत्रमंत्रक प्रधानता बढ़ि चुकल छल। ज्योतिषपर लोकक आस्था जमि चुकल छल। विजय सेनक देवपारा अभिलेखमे ग्राम ललनाक नगर जीवनक अनभिज्ञता आर अबोधपनक उल्लेख भेल अछि। मुसलमान लोकनि भारतमे पसरि चुकल छलाह तैं एहि युगमे शुद्धिक सिद्धांतक प्रतिपादन सेहो भेल। मिथिलामे पान आर चौपाड़िक प्रचलन खूब छल।
शबरस्वामीक लेखसँ तत्कालीन मैथिल समाजक झाँकी भेटैत अछि। ओ ‘हूराहिरी’क उल्लेख कएने छथि। शतपथ ब्राह्मणमे कहल अछि–
“तस्माद वराहं गावोऽन्य धावंती”।
गम्हारी, दही, दूध, चूड़ा, आदिक उल्लेख सेहो शबरस्वामीमे भेटइयै। इहो दास आर गुलामक उल्लेख कएने छथि। हुनका लेखनीसँ चिड़इ खेबाक प्रथाक अप्रत्यक्ष रूपे उदाहरण भेटइयै। दही भातक उल्लेख सेहो ओहिमे भेटइयै। माछ खेबाक निपुणताक वर्णनमे तँ एहने बुझि पड़ैत अछि–जेना शबरस्वामी नाचि उठल होथि। ओ खीर बनेबाक उल्लेख सेहो केने छथि।
- “ये एकस्मिन कार्यिन विकल्पेन साधकाः
श्रूयंते ते परस्परेण विरोधिनोभवंति।
लोकवन्–यथा मत्स्यांन् न पयसा
समश्नीयादिति। यद्दपि
सगुणमत्स्या भवंति तथापि
पयसा सहन समश्यंते”।
एहियुगमे जातिक रूप कायस्थ जातिक विकास आर उत्थान भेलैक। उशनस आर वेदव्यासक स्मृतिमे कायस्थक उल्लेख जातिक रूपमे भेल अछि। याज्ञवल्म्य स्मृतिमे सेहो कायस्थक उल्लेख भेल अछि। गुप्तकालीन अभिलेखमे सेहो प्रथम कायस्थक उल्लेख भेटइत अछि। गुणैगार ताम्रपत्रमे सैनिक मंत्री लोकनाथकेँ कायस्थ कहलगेल छन्हि। बंगाल–पूर्णियाँ क्षेत्रक पुण्ड्रवर्द्धन भुक्तिमे तीन चारि पुस्त धरि चिरातदत्त (करण कायस्थ) राज्यपाल छलाह। ५५०ई.क पश्चात् कायस्थ लोकनि एक जातिक रूपमे समाजमे स्थापित भए चुकल छलाह। ‘प्रथम कायस्थ’ मुख्य सचिव होइत छलाह। कायस्थमे अखन विशेष उपजातिक वृद्धि नहि भेल छल। ‘करण’ सेहो कायस्थक द्दोतक छलाह ओना ई एकटा ‘पद’ छल जाहिपर काज केनिहार सब केओ करणिक कहबैत छलाह आर जतए एकर मुख्यालय होइत छल तकरा अधिकरण कहल जाइत छल। मिथिलामे करण कायस्थक प्रभुता कर्णाटवंशक स्थापनाक संग बढ़लैक। वैशाली क्षेत्रमे ११–१२म शाताब्दीक एकटा लेख प्राप्त भेल अछि जाहिमे करण कायस्थक उल्लेख अछि। ई लेख बुद्धक प्रतिमाक पादपीठपर खोदल अछि। एहि मूर्त्तिक दान केनिहार करणिक महायान पंथी भक्त छलाह।
- “देय धर्मोऽयम् अवरमहायानयार्यिनः
-करणिकोच्छाहः माणिकसुतस्य”–
एवँ प्रकारे हम देखैत छी जे कर्णाट वंशक स्थापना धरि मिथिलाक समाज सब स्टेजसँ गुजरि चुकल छल। नान्यदेवक पछाति मिथिलाक अपन निखार प्रत्यक्ष भेलैक आर सामाजिक क्षेत्रमे जे क्रांतिकारी परिवर्त्तन भेलैक तकरे हमरा लोकनि हरिसिंह देवी प्रथाक नामे जनैत छी जकर प्रभाव अखन धरि मिथिलामे बनल अछि।
पंजी प्रथाक विकास:- महाराज हरिसिंह देव कर्णाटवंशक अंतिम शासक छलाह जे मुसलमान द्वारा पराजित भए पड़ा गेला। पड़ेबासँ पूर्व मिथिलाक सामाजिक नियमनक हेतु ओ जे एकटा विस्तृत व्यवस्था केलन्हि ओकरे अखुना हमरा लोकनि–‘हरिसिंह देवी’ प्रथाक नामे जनैत छी अथवा सुसंस्कृत भाषामे एकरा पंजी प्रथा कहल जाइत अछि। एहि सम्बन्धमे अखनो धरि कैक प्रश्नपर विद्वानक बीच मतभेद बनले अछि। ओना एहि प्रथाक जन्म देनिहार तँ हरिसिंह देवकेँ मानल जाइत छन्हि मुदा किछु विद्वानक अनुसारे एकर इतिहास प्राचीन अछि। कुलीन प्रथाक स्थापना जँ जन्मक विशुद्धतापर भेल छल तखन तँ एहि प्रसंगपर मीमाँसक कुमारिल भट्टक मंतव्य जे तंत्रवार्तिकमे प्रसारित अछि से देखब आवश्यक–
- “विशिष्टेनैवहि प्रयत्नेन महकुलीनाः
-परिरक्षंति आत्मानम्।
-अनेनैव हेतुना राजभिर्ब्राह्मणैश्च
-स्वपितृपितामहादि पारम्पर्या–
विस्मरणार्थ समूहलेख्यानि प्रवृत्तितानि
तथाच प्रतिकूलं गुणदोष स्मरणात्तदनुरूपः
प्रवृत्ति निवृत्तयो दृश्यंते”॥
अर्थ भेल जे कुलीनकेँ अपन जातिक रक्षाक हेतु बड्ड प्रयत्न करए पड़ैत छन्हि। तहितँ क्षत्रिय एवँ ब्राह्मण लोकनि अपन पिता पितामह प्रभृति पूर्वजक नाम बिसरि नहि जाई तैं “समूह संख्य” रखैत छथि आर प्रत्येक कुलमे गुण–दोषक विवेचन कए तदनुसार साबिध करबामे प्रवृत होइत छथि।
जँ एहि प्रमाणकेँ कुलीन प्रथा अथवा पाँजि रखबाक प्रथाक प्रारंभ मानल जाहक तँ ई कहए पड़त जे सर्वप्रथम एकर उदगम मिथिलामे भेल आर बादमे जखन लोग एकरा बिसरि गेलाह छल तखन हरिसिंह देव ओकरा वैज्ञानिक पद्धतिपर पंजीबद्ध करौलन्हि। सातम–आठम शताब्दीसँ हरिसिंह देव धरिक कालमे जँ लोग एहि ‘समूह लेख’ पद्धतिकेँ विसैरि गेलाह तँ कोनो आश्चर्यक गप्प नहि कारण एहि बीचमे मिथिलापर चारूकातसँ आक्रमण होइत रहल छल आर एक अस्थिरताक स्थिति व्यापक छल। कर्णाटवंशक स्थापनाक बाद पुनः एक प्रकार स्थायित्व आर नवजागरण आएल आर तैं सामाजिक उच्छृखंलतापर पूर्णविराम लगेबाक हेतु सामाजिक नियमनक आवश्यकता लोककेँ बुझि पड़लैक आर हरिसिंह देवकेँ ई श्रेय छन्हि जे ब्राह्मण–क्षत्रिय मध्य प्रचलित प्राचीन पद्धति अपना शासन कालमे पूर्ण रूपेण वैज्ञानिक बनौलन्हि।
स्वर्गीय रमानाथ झाक अनुसारे समूह लेख्य पाँजि जकाँ राखल जाइत छल आर प्रत्येक वैवाहिक सम्बन्ध भेल उत्तर ओहिपर टीपि लेल जाइत छल। कुमारिलक ‘समूह लेख्य’ समस्त ब्राह्मणक एकत्र संग्रहित भए पंजी कहाओल। एहि परिचय सबहिक आधारपर एक एक कुल एक एकटा नाम दए देल गेल जे नाम ओहिकुलक पूर्वजक आदिम ज्ञात निवास स्थान गामक नामपर भेल ओ सैह ओहि कुलक मूल कहाओल। कुमारिलक सभ्यमे गुणदोषक विवेचन लोग स्वयं करैत छल मुदा हरिसिंह देवीक बाद आब परिचयक आधारपर गुण–दोषक विवेचण होएब प्रारंभ भेल। बंगालक कुलीन प्रथा जाति मूलक छल आर अकुलीनक संपर्क होइतहुँ कुलीन अपन कुलीनत्वसँ पतित भए जाइत छल। मिथिलामे उच्चता–नीचताक अवधारण स्मृतिक अनुसारहि भेल। मनुक उक्ति देखबा योग्य अछि–
- “कुविवाहैः क्रियालोपैर्वेदाध्ययनेन च
-कुलान्यकुलताँ यांति ब्राह्मणाइक्रमेण च”–
- उतमैरूतमैर्नित्यं सम्बन्धाना चरेत्सह
-निनिषुः कुलमुत्कर्षमधमानधमाँस्त्यजेत्”॥
- उपरोक्तसँ स्पष्ट अछि जे जातिक अपकर्ष किंवा उत्कर्ष वैवाहिक सम्बन्धसँ नियमित होइत छल। मुदा मात्र जन्मक शुद्धिमात्र एकर नियामक नहि छल। भवभूतिक मालती माधवक टीकामे धर्माधिकरणिक जगद्धर लिखने छथि–
- “जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्काराद् द्विज उच्यते
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